एक साल में कितना बदल गया मोदी का काशी, जानें
सांसद बनने के बाद पहली बार अपने संसदीय क्षेत्र पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दशाश्वमेध घाट पर कहा था, ‘जब तक काशी राष्ट्रगुरु नहीं बनेगा, भारत विश्व गुरु नहीं बन सकता। मैं इस पवित्र धरती के लिए कुछ करने आया हूं।’
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मोदी के सांसद बने एक साल हो चुके हैं। अस्सी घाट के पास पप्पू टी स्टाल से लेकर बीएचयू के हॉस्टलों तक में आकलन हो रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी के शब्द हकीकत में कितने तब्दील हुए हैं? कुछ मायूस हैं तो कई बेहतर भविष्य को लेकर आशान्वित। उन्हें लगता है कि मोदी ने काशी के विकास की जो बुनियाद रखी है, उसकी बुलंदिया तीन-चार साल में दिखाई पड़ेंगी।
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काशी का अपना अल्हड़ मिजाज, अपनी सोच और धारणाएं हैं। लोगों में काशी का निवासी होने का गौरव और स्वाभिमान है। बाबा विश्वनाथ मंदिर, सारनाथ, कबीर, प्रेमचंद और संत रैदास की भूमि, गंगा के घाट, बनारसी साड़ी और सांस्कृतिक, आध्यात्मिक केंद्र के लिए मशहूर काशी वैसे तो पूर्वांचल के अगड़े जिलों में शुमार है, फिर भी विकास की कसक बहुत नहीं।
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लोकसभा चुनाव में मोदी ने सिर्फ और सिर्फ विकास एवं काशी के गौरव को मुद्दा बनाया। उनके सांसद और प्रधानमंत्री बनने के बाद यहां के लोगों की विकास की उम्मीदों को पंख लग गए। कभी काशी को क्योटो (जापान) का ट्विन सिटी बनाने की बातें हुईं तो बुनकरों के ट्रेड फैलिसेशन सेंटर और क्राफ्ट म्यूजियम का शिलान्यास हुआ। फिलहाल तो यह कि न तो काशी जापान का ट्विन सिटी बनने जा रहा है और न ही बुनकरों की स्थिति में कोई सुधार हो पाया है।
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एनजीओ, संस्थाओं में घाट की सूरत बदलने की लग गई होड़
मोदी ने नवंबर 2014 में अस्सी घाट पर फावड़ा चलाकर घाटों की सफाई का अभियान शुरू किया था। उन्होंने गैर सरकारी संगठनों समेत विभिन्न संस्थाओं से इस काम में मदद का आह्वान किया था। उनकी अपील पर घाटों की सफाई की होड़ लग गई। अस्सी में पप्पू टी स्टाल पर चाय पी रहे बीएचयू के शोध छात्र अभिजीत त्रिपाठी और गदौलिया निवासी राम शंकर जायसवाल कहते हैं कि घाटों की सफाई जरूर हुई है, पर इसमें सरकार का सीधे तौर पर योगदान नहीं है।