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हिंदी के माथे की बिंदी बन चमक रहीं युवा रचनाकार, विदेशों तक में हैं बेहद लोकप्रिय
Mon, 14 Sep 2020 03:12 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
अभिषेक सहज, अमर उजाला, लखनऊ
अभिषेक सहज, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Mon, 14 Sep 2020 03:12 PM IST
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शिखा श्रीवास्तव और कविता
- फोटो : amar ujala
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लखनऊ की युवा कवयित्रियां और लेखिकाएं भी हिंदी के उत्थान में अपना अमूल्य योगदान दे रही हैं। कविता तिवारी और शिखा श्रीवास्तव जैसी कवयित्रियां तो देशभर में ही नहीं, विदेशों तक में अपनी रचनाओं से बेहद लोकप्रिय हैं। आइये आज हम आपकी मुलाकात करवा रहे हैं राजधानी की कुछ ऐसी ही युवा कलमकारों से जिन्होंने हिंदी मंचों पर न सिर्फ अपना अलग मुकाम बनाया बल्कि हिंदी के नवांकुरों के लिए प्रेरणा भी बनीं।
कविता तिवारी
- फोटो : amar ujala
कविता ने दी ओज को प्रखर पहचान
वैसे तो हिंदी मंचों पर ज्यादातर कवयित्रियां शृंगार रस में ही कविता पढ़ रही हैं, लेकिन शुद्ध हिंदी में कविता पढ़ने वाली कवयित्रियों में लखनऊ की कविता तिवारी देश की सबसे समृद्ध कवयित्रियों में शामिल हैं। कविता ने बहुत कम समय में हिंदी मंचों पर अपनी अलग पहचान बना ली है। देश के सभी बड़े मंचों पर कविता की उपस्थिति उस समारोह की सफलता की गारंटी मानी जाती है। उनके सोशल मीडिया पर लाखों प्रशंसक हैं। उन्हें हिंदी में कविता पढ़ते देख नए रचनाकार भी खासे प्रभावित होते हैं।
वैसे तो हिंदी मंचों पर ज्यादातर कवयित्रियां शृंगार रस में ही कविता पढ़ रही हैं, लेकिन शुद्ध हिंदी में कविता पढ़ने वाली कवयित्रियों में लखनऊ की कविता तिवारी देश की सबसे समृद्ध कवयित्रियों में शामिल हैं। कविता ने बहुत कम समय में हिंदी मंचों पर अपनी अलग पहचान बना ली है। देश के सभी बड़े मंचों पर कविता की उपस्थिति उस समारोह की सफलता की गारंटी मानी जाती है। उनके सोशल मीडिया पर लाखों प्रशंसक हैं। उन्हें हिंदी में कविता पढ़ते देख नए रचनाकार भी खासे प्रभावित होते हैं।
शिखा श्रीवास्तव
- फोटो : amar ujala
रेलवे में हिंदी का चेहरा हैं शिखा श्रीवास्तव
रेल प्रबंधक कार्यालय उत्तर रेलवे लखनऊ में कार्यरत शिखा श्रीवास्तव ने सामाजिक सरोकार और शृंगार की रचनाओं से देश के बड़े काव्य मंचों से लेकर विदेश तक में काव्यपाठ किया है। साथ ही टीवी चैनल्स पर भी कार्यक्रमों में उनकी बराबर सहभागिता रहती है। शिखा रेलवे में हिंदी का चेहरा हैं।
अपनी मातृभाषा पर दिया जाए जोर
परीक्षार्थियों की हिंदी में दयनीय स्थिति के बारे में शिखा कहती है कि यह जमाना अब कम्प्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन का है अब हम कागज पर लिखने की बजाय की बोर्ड पर ज्यादा लिखते है इसलिए सरकार को चाहिए कि स्कूलों में बच्चों को कागज पर हिंदी लिखना सिखाने के साथ उन्हें हिंदी टाइपिंग में दक्ष बनाए। साथ ही पचास के दशक में गठित वैज्ञानिकी और तकनीकी शब्दावली आयोग का पुनर्गठन करके शब्द निर्माण मामले में सरलीकरण की आवश्यकता है। केंद्र और राज्य सरकारों को दसवीं के बजाय 12वीं कक्षा तक हिंदी भाषा और साहित्य को अनिवार्य भाषा बनाना चाहिए और विदेशी जर्मन, फैंच भाषा सीखने की बजाय अपनी मातृभाषा सीखने पर जोर देना चाहिए।
रेल प्रबंधक कार्यालय उत्तर रेलवे लखनऊ में कार्यरत शिखा श्रीवास्तव ने सामाजिक सरोकार और शृंगार की रचनाओं से देश के बड़े काव्य मंचों से लेकर विदेश तक में काव्यपाठ किया है। साथ ही टीवी चैनल्स पर भी कार्यक्रमों में उनकी बराबर सहभागिता रहती है। शिखा रेलवे में हिंदी का चेहरा हैं।
अपनी मातृभाषा पर दिया जाए जोर
परीक्षार्थियों की हिंदी में दयनीय स्थिति के बारे में शिखा कहती है कि यह जमाना अब कम्प्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन का है अब हम कागज पर लिखने की बजाय की बोर्ड पर ज्यादा लिखते है इसलिए सरकार को चाहिए कि स्कूलों में बच्चों को कागज पर हिंदी लिखना सिखाने के साथ उन्हें हिंदी टाइपिंग में दक्ष बनाए। साथ ही पचास के दशक में गठित वैज्ञानिकी और तकनीकी शब्दावली आयोग का पुनर्गठन करके शब्द निर्माण मामले में सरलीकरण की आवश्यकता है। केंद्र और राज्य सरकारों को दसवीं के बजाय 12वीं कक्षा तक हिंदी भाषा और साहित्य को अनिवार्य भाषा बनाना चाहिए और विदेशी जर्मन, फैंच भाषा सीखने की बजाय अपनी मातृभाषा सीखने पर जोर देना चाहिए।
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डॉ कीर्ति अवस्थी
- फोटो : amar ujala
अंग्रेजी की शिक्षिका हैं हिंदी की कहानीकार
डॉ. कीर्ति अवस्थी अंग्रेजी विषय की शिक्षिका होने के साथ हिंदी कथा साहित्य के क्षेत्र में निरंतर क्रियाशील हैं। आपका एक कहानी संग्रह सुबह का चांद वर्ष 2019 में प्रकाशित हो चुका है। इसके अतिरिक्त देश-विदेश की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में आप की कहानियां प्रकाशित हुई हैं। डॉ. कीर्ति एक यूट्यूब चैनल की संचालिका भी हैं। उनका दूसरा कहानी संग्रह ‘खुशी-बेवजह’ प्रकाशित होने वाला है। उन्हें कहानी संग्रह ‘सुबह का चांद’ के लिए प्रज्ञा साहित्य सम्मान 2019 तथा मुसन्निफ ए अवध 2020 से सम्मानित किया गया है।
अमर उजाला के अभियान ने हिंदी सेवियों को जगा दिया
डॉ. कीर्ति मानती हैं कि हिंदी हैं हम अभियान ने पूरे देश के हिंदी सेवियों को जगाने का काम किया है। इस अभियान ने आशा की नई किरण का काम किया है।
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डॉ. कीर्ति अवस्थी अंग्रेजी विषय की शिक्षिका होने के साथ हिंदी कथा साहित्य के क्षेत्र में निरंतर क्रियाशील हैं। आपका एक कहानी संग्रह सुबह का चांद वर्ष 2019 में प्रकाशित हो चुका है। इसके अतिरिक्त देश-विदेश की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में आप की कहानियां प्रकाशित हुई हैं। डॉ. कीर्ति एक यूट्यूब चैनल की संचालिका भी हैं। उनका दूसरा कहानी संग्रह ‘खुशी-बेवजह’ प्रकाशित होने वाला है। उन्हें कहानी संग्रह ‘सुबह का चांद’ के लिए प्रज्ञा साहित्य सम्मान 2019 तथा मुसन्निफ ए अवध 2020 से सम्मानित किया गया है।
अमर उजाला के अभियान ने हिंदी सेवियों को जगा दिया
डॉ. कीर्ति मानती हैं कि हिंदी हैं हम अभियान ने पूरे देश के हिंदी सेवियों को जगाने का काम किया है। इस अभियान ने आशा की नई किरण का काम किया है।
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शालिनी पांडेय
- फोटो : amar ujala
अपने लेखन के साथ दूसरों को भी दे रहीं बढ़ावा
शालिनी पांडेय सरल यूं तो सरकारी शिक्षिका हैं, लेकिन हिंदी साहित्य के प्रति अपनी रुचि के कारण काव्य लेखन में भी सक्रिय हैं। मंचों पर काव्य पाठ के अलावा उन्होंने साहित्यांगन नाम से एक संस्था की शुरुआत की है, जिसमें वे हिंदी कलमकारों को प्रोत्साहित करती हैं। शालिनी ने बताया कि अमर उजाला का हिंदी हैं हम अभियान हर वर्ग के लेखकों, कवियों और आम जन के लिए लाभकारी तो है ही साथ में नई पीढ़ी को भी इससे प्रेरणा मिलेगी।
शालिनी पांडेय सरल यूं तो सरकारी शिक्षिका हैं, लेकिन हिंदी साहित्य के प्रति अपनी रुचि के कारण काव्य लेखन में भी सक्रिय हैं। मंचों पर काव्य पाठ के अलावा उन्होंने साहित्यांगन नाम से एक संस्था की शुरुआत की है, जिसमें वे हिंदी कलमकारों को प्रोत्साहित करती हैं। शालिनी ने बताया कि अमर उजाला का हिंदी हैं हम अभियान हर वर्ग के लेखकों, कवियों और आम जन के लिए लाभकारी तो है ही साथ में नई पीढ़ी को भी इससे प्रेरणा मिलेगी।