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PUBG Killer: गेमिंग डिसॉर्डर से आत्महत्या और हत्या जैसे कृत्यों के शिकार हो रहे बच्चे, डॉक्टर बोले- गंभीर खतरे के ये हैं संकेत

Thu, 09 Jun 2022 04:01 PM IST
ishwar ashish माई सिटी रिपोर्टर, अमर उजाला, लखनऊ
माई सिटी रिपोर्टर, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Thu, 09 Jun 2022 04:01 PM IST
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Children are being the victims of gaming disorder.
- फोटो : amar ujala

राजधानी लखनऊ में मोबाइल गेम खेलने से रोके जाने पर मां की हत्या कर देने की घटना से हर कोई सन्न है। वहीं, मनोचिकित्सकों के अनुसार इसकी बड़ी वजह गेमिंग डिसॉर्डर है। उनके अनुसार अगर आपका बच्चा चार घंटे से ज्यादा मोबाइल के स्क्रीन पर समय बिता रहा है तो वह उसका लती हो सकता है। यह लत हद से ज्यादा बढ़ने पर बच्चे गेम और वास्तविक जीवन में अंतर करना बंद कर देते हैं। यहां तक कि गेम की घटनाओं को वास्तविक जीवन में कर देते हैं।



केजीएमयू के मनोरोग विभाग के डॉ. पवन कुमार गुप्ता के अनुसार गेमिंग डिसॉर्डर की पहचान बहुत जरूरी है। सही समय पर ऐसा होने से इलाज संभव है। वहीं, देरी पर परिणाम गंभीर हो सकते हैं। अगर आपका बच्चा ज्यादा समय तक गेम खेलता है, चिड़चिड़ा हो रहा है, सही से सो नहीं रहा तो ये गंभीर खतरे के संकेत हैं।

ज्यादा देर तक गेम खेलने की वजह से बच्चे हर वक्त उसके बारे में ही सोचते रहते हैं। यहां तक कि गेम नहीं खेलते समय भी उनका दिमाग उसी में चल रहा होता है। वीडियो गेम की ग्राफिक और थ्रीडी इमेज उन्हें ज्यादा आकर्षित करती है और वे इससे अलग नहीं सोच पाते हैं।

Children are being the victims of gaming disorder.
- फोटो : PLAY STORE

मोबाइल रेग्युलेशन बेहद जरूरी
डॉ. पवन के अनुसार भारत में मोबाइल रेग्युलेशन बहुत जरूरी है। अपने देश में अभी भी मोबाइल का इस्तेमाल करने के लिए बच्चों की उम्र तय नहीं है, जबकि कई देशों में ऐसा है। जिस तरह से गाड़ी चलाने के लिए लाइसेंस चाहिए, वैसे ही मोबाइल के लिए भी नियम-कानून बनने चाहिए। दो साल तक के बच्चे को तो मोबाइल की स्क्रीन बिलकुल नहीं दिखानी चाहिए, क्योंकि इस समय में ही उनका 80 प्रतिशत मस्तिष्क विकसित हो जाता है। 10 साल तक की उम्र के बच्चों को अधिकतम एक घंटा ही मोबाइल देखना चाहिए। इससे बड़े बच्चों के लिए भी चार घंटे अधिकतम अवधि है।

Children are being the victims of gaming disorder.
- फोटो : istock

ओपीडी में रोज आ रहे मरीज
बच्चों में गेमिंग की लत बढ़ने का असर ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या पर भी दिख रहा है। केजीएमयू के मनोरोग विभाग की ओपीडी में रोजाना चार से पांच बच्चे मोबाइल की लत वाले आते हैं।

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Children are being the victims of gaming disorder.
- फोटो : amar ujala

कमजोर हो रहा है भावनात्मक नियंत्रण
केजीएमयू के मनोरोग विभाग की डॉ. पूजा माहौर के अनुसार शोध बताते हैं कि मोबाइल एडिक्शन से असमानता विकसित हो रही है। व्यवहार के साथ ब्रेन केमिकल्स की वजह से ब्रेन की फंक्शनिंग और स्ट्रक्चर में भी बदलाव आ रहा है। इससे सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा व भावनात्मक नियंत्रण नहीं हो पा रहा है।

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Children are being the victims of gaming disorder.
- फोटो : social media

मोबाइल की लत दूर करने के लिए ये करें
- मोबाइल के इस्तेमाल के घंटे निर्धारित करें।
- प्लान करेंगे आज मोबाइल पर क्या-क्या काम करना है।
- दिनचर्या तय करें, जिसमें सभी तरीके के काम शामिल हों।
- परिवार के सभी लोगों की मौजूदगी में मोबाइल का कम से कम इस्तेमाल।
- मोबाइल के इस्तेमाल के लिए ब्लेम गेम ना खेलें।
- आम बातचीत में मोबाइल गेमिंग से संबंधित बातें कम से कम करें।
- बच्चों को अन्य गतिविधियों में लगाएं।
- वैधानिक चेतावनी वाले खेलों को गंभीरता से लें।
- बच्चों को समझाएं, थोड़े समय की खुशी आगे बड़ा नुकसान कर सकती है।

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