वैवाहिक रस्में और परंपराएं किसी ने नहीं बदलीं। बदला है तो रस्में निभाने और परंपराओं को अपनाने का तरीका। भरपूर फैशन व ग्लैमर का तड़का लगाकर पहले से कहीं ज्यादा उत्साह के साथ वैवाहिक परंपराएं निभाई जा रही हैं। शादियों के बदलते ट्रेंड के बीच ये देखना और सुनना बेहद सुखद है कि समारोहों की भव्यता के पीछे मकसद अपनी अमीरी या शान-ओ-शौकत को दिखाना नहीं बल्कि जिनसे वर्षों नहीं मिले, उनसे भी शादी के बहाने मुलाकात करना है। एक साथ परिवार के साथ वक्त बिताने का बहाना भर है। आइए जानते हैं शादियों के बदलते ट्रेंड के साथ परंपराएं किस तरह से फल-फूल रही हैं:
रोका के बाद साल भर तक आयोजन
गोवा के बीच पर बैचलर्स पार्टी करके लौटे एक भावी वर-वधू ने बताया कि बैचलर्स पार्टी का ट्रेंड है। हम भी इसे फॉलो कर रहे हैं। मम्मी-पापा की इजाजत से हम जाते हैं। दरअसल ये मौका है एक-दूसरे को जानने और समझने का। जिंदगी में खुशियां जितनी भी मिलें बटोर लेनी चाहिए। काम से इतर कुछ पहल अपने और परिवार के लिए भी जरूरी है।
सोशल एक्टिविस्ट व सराफा कारोबारी सलोनी केसरवानी कहती हैं कि इस सहालग में मैंने चार शादियां व सगाई पार्टी अभी तक अटैंड की है। कॉकटेल व बैचलर्स पार्टी सभी ने की है। बिना इसके अब शादियां कहां होती हैं। वहीं चौक निवासी मिसेज चारू कहती हैं कि बेटी की शादी फरवरी में है, लेकिन वो अपनी बैचलर पार्टी गोवा में करके आई है। वहीं पर होने वाले दामाद भी पहुंचे थे। उन्होंने अपने दोस्तों को बैचलर पार्टी अलग से दी थी। वेडिंग प्लानर हामिद कहते हैं कि 10 शादियों में से चार में बैचलर पार्टी और छह में कॉकटेल पार्टी जरूर से होती है। हामिद कहते हैं कि शादी तय होने से लेकर विदाई तक का फंक्शन अब तो साल भर तक चलता है।
हर फंक्शन होता है त्योहार की तरह
हाल ही में एक ऐसी ही शादी की फोटोग्राफी में जुटे फोटोग्राफर विष्णु गुप्ता कहते हैं कि इस क्लाइंट में हमें साल भर के लिए बुक किया है। पहले रोका, फिर बैचलर पार्टी, फिर हल्दी-मेहंदी समेत अन्य रस्में निभाई जा रही हैं। क्लाइंट का मानना है कि इन्हीं आयोजनों के बहाने रिश्तेदार, दोस्त-यारों के साथ वक्त बिताने का मौका मिलता है।
बन्ना-बन्नी या ढोलक नहीं, अब डीजे वाले बाबू
वेडिंग प्लानर हर्षिता विजय कहती हैं कि बन्ना-बन्नी या ढोलक तो हम लोगों ने न देखा न सुना। एक समय था कि ढोलक की पूजा लेडीज संगीत से पहले होती थी। बन्ना-बन्नी की शुरुआत देवी गीत और गणेश वंदना से होती थी। आज भी ऐसा होता है, लेकिन परंपराओं का निर्वहन मानकर कर लिया जाता है। शादियों का उत्साह तो ढोल और डीजे की धुन पर ही दिखता है। इसी तरह अब दुल्हन शरमाते, सकुचाते हुए एंट्री नहीं करती, बल्कि नाचते-गाते जयमाल के स्टेज तक पहुंचती है।
चौक निवासी उषा अग्रवाल की बेटी की शादी होनी है। वे कहती हैं कि मेहंदी पहले घर की महिलाएं ही लगा लेती थीं लेकिन अब दिल्ली या बाहर से डिजाइनर को बुलवाया जा रहा है। हल्दी भी सात सुहागिनों से करवा ली जाती थी, अब सारे नाते रिश्तेदार इकट्ठा होंगे, गेम्स होंगे और तरह-तरह के आयोजनों के साथ हल्दी की रस्म पूरी की जाएगी।