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डॉक्टरों की करतूत की LIVE REPORT: इस मरीज का इलाज यहां इलाज संभव नहीं

Mon, 25 Jul 2016 02:41 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ Updated Mon, 25 Jul 2016 02:41 PM IST
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carelessness of sgpgi and kgmu's doctors
बीपी ‌द्विवेदी - फोटो : amar ujala
शहर के दो बड़े चिकित्सा संस्थान हैं एसजीपीजीआई और केजीएमयू। हालत बेहद गंभीर हो तो इन संस्थानों से एक उम्मीद होती है। पर इन बड़े संस्थानों में मरीज को इस अस्पताल से उस अस्पताल तक दौड़ाया जाता है। रविवार को ‘अमर उजाला’ टीम ने इन दोनों संस्थानों की इमरजेंसी के हालात देखे। जो कुछ देखने को मिला उसे आप पढ़िए और उस दर्द को जरा महसूस कीजिए


ये है केजीएमयू का हाल
करीब चार बजे गोंडा के मानसिक रोग से पीड़ित बीपी द्विवेदी (65) को लेकर परिवारीजन मानसिक रोग विभाग पहुंचे। डॉक्टरों ने बुखार और उल्टी दस्त की शिकायत बताकर ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया। स्थानीय परिवारीजन रत्नेश द्विवेदी बीपी द्विवेदी को अपने एक रिश्तेदार की मदद से स्कूटी पर लादकर ट्रॉमा पहुंचे। पर पहले वहां स्ट्रेचर नहीं मिला। जैसे-तैसे स्ट्रेचर ढूंढा तो उसमें तीन पहिए ही थे। बीपी द्विवेदी ही नहीं,  कई मरीज इसी तीन पहिए के स्ट्रेचर के सहारे लाए जाते रहे। 
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पूनम मिश्रा - फोटो : amar ujala

बदायूं, ककटालपुर के रजनीश मिश्रा की मां पूनम मिश्रा (40) को पेट संबंधी बीमारी के बाद परिवारीजन सबसे पहले एसजीपीजीआई लेकर पहुंचे। बेटा रजनीश बताता है कि 21 जुलाई को इमरजेंसी के बेड नंबर 11 पर वहां भर्ती कर लिया गया। इलाज के बाद हालत नहीं सुधरी और 22 जुलाई को एक स्लिप थमाकर डिस्चार्ज कर दिया गया।  रविवार दोपहर करीब तीन बजे परिवार पूनम को लिए केजीएमयू, ट्रॉमा सेंटर पहुंचा। ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टरों ने कहा- आज गैस्ट्रो का कोई डॉक्टर नहीं है। मरीज को शताब्दी अस्पताल लेकर जाओ। इसके बाद बेबस और लाचार परिवारीजन ट्रॉमा सेंटर के बाहर इलाज की आस में खड़े रहे।

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रामकेश - फोटो : amar ujala

ये है पीजीआई का हाल

कानपुर देहात, अकबरपुर के रामकेश (36) को पेट की बीमारी है। भाई रामजीवन ने बताया कि शनिवार दोपहर में तबीयत अचानक खराब हो गई। स्थानीय डॉक्टर ने तुरंत एसपीजीआई के लिए रेफर कर दिया। आनन-फानन में रात ग्यारह बजे यहां इमरजेंसी पहुंचे तो डॉक्टरों ने देखने के बाद कह दिया कि इस तरह के मरीजों का इलाज यहां नहीं होता है। रामजीवन बताता है कि पीआरओ ऑफिस के पास स्थित रजिस्ट्रेशन काउंटर और इमरजेंसी वार्ड के कई चक्कर लगाए तो जवाब मिला-शनिवार, रविवार को इमरजेंसी में इलाज नहीं मिलता। 

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मनोज - फोटो : amar ujala

बक्सर, अखौरीपुर के लोचन के बेटे मनोज (36) को हीमोफिलिया की शिकायत है। बीपीएल कार्ड धारक मनोज का मुफ्त इलाज होना चाहिए। पर उसे रविवार दोपहर डिस्चार्ज कर दिया गया। उसका दाहिना पैर सूजा है। इस पैर से खून भी बह रहा है। उसके आंखों में आंसू हैं। सवाल होते ही वह बोल पड़ा-फरवरी से एसजीपीजीआई में इलाज चल रहा है। 15 जुलाई को फैक्टर-8 चढ़ाने के लिए उसे भर्ती किया गया। अब तक दवा और इंजेक्शन पर 6500 रुपये खर्च हो गए। दोपहर एक बजे आए डॉक्टर ने कहा-आपके अकाउंट में पैसा नहीं है। एक घंटे में पैसे का बंदोबस्त कर लो। इंतजाम नहीं हो सका तो डिस्चार्ज कर दिया। खून बहने का हवाला दिया तो पांच पट्टी हाथ पर धर दी और बाहर का रास्ता दिखा दिया। ताकीद भी किया कि जख्म पर लगातार पट्टी करते रहना नहीं तो परेशानी बढ़ जाएगी। 
 

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रामकली - फोटो : amar ujala

अमेठी, अमरपुर के गिरीश कुमार की मां रामकली (54) कई दिनों से बुखार से पीड़ित हैं। हालत बेहद खराब हो गई। अमेठी के जिला अस्पताल से उन्हें एसजीपीजीआई का रास्ता दिखा दिया गया। परिवार वाले उसे लेकर दोपहर डेढ़ बजे एसजीपीजीआई की इमरजेंसी में पहुंचते हैं। पर डॉक्टर उन्हें देखने से इंकार कर देता है। चीखकर कहता है- यहां किसने भेजा है...केजीएमयू ले जाओ।  परिवार के लोग इस उम्मीद में थे कि शायद डॉक्टर का दिल पसीज जाए। पर, थोड़ी देर बाद मरीज के कागज मंगाए गए। उसपर अंग्रेजी में दो शब्द लिख दिए गए- नो बेड। ...और कहा गया-इस मरीज का इलाज यहां संभव नहीं है। 

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