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हो जाएं सर्तक: भागमभाग भरी जिंदगी युवाओं को दे रही ये बीमारी, पहचानें लक्षण और ऐसे करें बचाव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sun, 01 Jul 2018 12:47 AM IST
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- फोटो : डेमो
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भागमभाग भरी जिंदगी और अकेलापन युवाओं को अवसाद की ओर ले जा रहा है। यही वजह है कि युवाओं में अवसाद का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञ इसके पीछे सामाजिक कारण को ज्यादा जिम्मेदार मानते हैं।
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अवसाद के मरीजों में युवाओं की तादात तेजी से बढ़ रही है। करीब 50 फीसदी मरीज 35 से 60 साल के बीच के हैं। इसमें 35 से 45 की उम्र वालों की संख्या ज्यादा है। केजीएमयू के मानसिक चिकित्सा विभाग की ओपीडी और भर्ती होने वाले मरीजों के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। इतना ही नहीं केजीएमयू में सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च ट्रेनिंग एंड सर्विसेज (कार्ट्स) एवं लखनऊ एल्डर्स स्टडी (लेस) के आंकड़े भी कुछ इसी ओर इशारा करते हैं।
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चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि हर किसी के पास वक्त की कमी है। परिवार के बीच कम बातचीत होने एवं सोशल मीडिया भी अवसाद की एक वजह बनी है। तमाम मरीजों से बातचीत में पता चला है कि वे देर रात तक मोबाइल पर लगे रहते हैं। इस वजह से उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती। धीरे-धीरे वे अवसाद की ओर बढ़ जाते हैं। केजीएमयू से जुड़ी संस्था कार्ट्स एवं लेस की ओर से लखनऊ के अलग-अलग इलाके में किए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि 45 से 59 आयु वर्ग में 50 फीसदी लोगों में अवसाद की बीमारी पाई गई है।
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डेमो
....इसलिए हैं अवसाद में
केस-1
नहीं मिली नौकरी, कोचिंग भी हो गया बंद
रमेश (परिवर्तित नाम) के माता-पिता दोनों इंटर कॉलेज में प्रवक्ता है। वह शुरू से ही अकेला रहा है। अंग्रेजी में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद भी नौकरी नहीं मिली। कुछ दिन कोचिंग सेंटर चलाया, लेकिन बाद में बंद हो गई अब वह अवसाद का शिकार है। केजीएमयू के मानसिक चिकित्सा विभाग में इलाज चल रहा है।
केस-1
नहीं मिली नौकरी, कोचिंग भी हो गया बंद
रमेश (परिवर्तित नाम) के माता-पिता दोनों इंटर कॉलेज में प्रवक्ता है। वह शुरू से ही अकेला रहा है। अंग्रेजी में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद भी नौकरी नहीं मिली। कुछ दिन कोचिंग सेंटर चलाया, लेकिन बाद में बंद हो गई अब वह अवसाद का शिकार है। केजीएमयू के मानसिक चिकित्सा विभाग में इलाज चल रहा है।
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केस 2
टीचर बनना चाहती थीं, कर रहीं मेडिकल की तैयारी
रागिनी (बदला हुआ नाम) डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थी। वह नीट सहित अन्य मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में बैठ चुकी है, लेकिन सफलता नहीं मिली। पिछले छह माह से उसका अवसाद का इलाज चल रहा है। इलाज के दौरान काउंसलिंग में पता चला कि वो डॉक्टर के बजाए अध्यापिका बनना चाहती थीं।
टीचर बनना चाहती थीं, कर रहीं मेडिकल की तैयारी
रागिनी (बदला हुआ नाम) डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थी। वह नीट सहित अन्य मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में बैठ चुकी है, लेकिन सफलता नहीं मिली। पिछले छह माह से उसका अवसाद का इलाज चल रहा है। इलाज के दौरान काउंसलिंग में पता चला कि वो डॉक्टर के बजाए अध्यापिका बनना चाहती थीं।