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भिखारियों का कार्पोरेट कल्चर: 15 दिनों में बदल जाती है शिफ्ट, हर बस्ती का होता है एक दादा, घरों में टीवी-कूलर सबकुछ

Tue, 09 Feb 2021 03:13 PM IST
ishwar ashish सुधांशु सक्सेना, अमर उजाला, लखनऊ
सुधांशु सक्सेना, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Tue, 09 Feb 2021 03:13 PM IST
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A story on beggar colony of Lucknow.
- फोटो : amar ujala

राजधानी लखनऊ के प्रमुख चौराहों से लेकर मॉल्स व पार्कों के बाहर हाथ फैलाकर दो निवालों के लिए चंद पैसे मांगने वाले भिखारियों की एक अजब दुनिया है। असंगठित दिखने वाले इन भिखारियों की अपनी बस्ती है और खास नियम-कानून भी। कहीं इनके मुखिया को दादा तो कहीं कप्तान कहा जाता है। बस्तियां अपने मुखिया के इशारे पर ही चलती हैं। इनकी बस्तियां चिनहट की बलरामनगर, अलीगंज, निशातगंज और सदर की डेरा बस्ती के अलावा शहर के कई अन्य स्थानों पर भी हैं। यही दादा भिखारियों की टोलियां और शिफ्ट बनाते हैं।



खास बात यह कि टोलियों का निर्धारण जगह देखकर किया जाता है। जैसे कि धार्मिक स्थल के बाहर महिलाओं व बच्चों की संख्या बढ़ा दी जाती है जबकि पर्यटन स्थलों पर फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वालों को भेजा जाता है। यही दादा पिक एंड ड्रॉप सर्विस भी संभालते हैं। हर टोली के लिए एक ई-रिक्शा या टेंपो होता है। जब शाम को टोलियां लौटती हैं तो दादा वसूली करते हैं और पूरा ध्यान रखते हैं। पेश है भिखारियों के ‘कारपोरेट कल्चर’ की एक खास रिपोर्ट...

A story on beggar colony of Lucknow.
- फोटो : amar ujala

सुबह सात बजते ही निकल पड़ते हैं भिखारी
बलरामनगर स्थित भिखारियों की बस्ती के संकरे रास्ते के मुहाने पर सुबह छह बजते ही टैंपो व ई-रिक्शा खड़े दिखाई देते हैं। पता चला कि ये वाहन भिखारियों को दूरदराज चौराहों तक ले जाने के लिए आए हैं। इसी तरह से अलग-अलग बस्तियों से प्रमुख चौराहों तक भिखारी पहुंचाए जाते हैं और शाम को वापसी भी करते हैं।

A story on beggar colony of Lucknow.
- फोटो : amar ujala

अंग्रेजी दिलाती है भीख की मोटी रकम
बलरामनगर बस्ती के भिखारी अतर सिंह ने बताया कि कुछ एनजीओ वाले पढ़ाने आते हैं, उनसे बच्चों को अंग्रेजी सीखने पर जोर दिया जाता है। उनकी बस्ती में करीब 50 घर हैं और आबादी करीब 500 है। इनमें करीब 200 महिलाएं, 150 बच्चे व शेष पुरुष हैं। पुरुष शहर के अलावा अयोध्या, मथुरा, काशी और आगरा जैसे उन शहरों में भी जाते हैं, जहां विदेशी पर्यटकों से मोटी भीख मिलने की उम्मीद रहती है। यहां अंग्रेजी की जरूरत पड़ती है। वहीं, दूसरे भिखारी गोरखनाथ ने बताया कि बस्ती के ज्यादातर पुरुष बाहर गए हैं और दिनभर पर्यटन व धार्मिक स्थलों पर भीख मांगते हैं। सभी त्योहार में लौटेंगे और तब हिसाब होगा। वहीं, शहर में भीख का हिसाब रोज होता है।

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A story on beggar colony of Lucknow.
- फोटो : amar ujala

हर 15 दिन में बदलती है शिफ्ट
फूलमती ने बताया कि वो पहले पॉलीटेक्निक पर भीख मांगती थीं, अब बटलर चौराहे पर घूम-घूमकर भीख मांगती हैं। बस्ती के बड़े लोग ऐसा करने को कहते हैं क्योंकि एक बार लोग पहचान जाएं तो भीख नहीं देते। वह निशातगंज से बच्चे के साथ ही आती हैं। उसके बेटे ने बताया कि वह सुबह टैंपो से मां संग निकलता है और शाम को बस्ती लौटता है।

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A story on beggar colony of Lucknow.
- फोटो : amar ujala

कलर टीवी-कूलर व अन्य सामान
सदर इलाके की डेरा बस्ती में इतनी संकरी गलियां हैं कि पैदल चलकर ही निकला जा सकता है। इन गलियों में दिन में नशे करते युवा, बुजुर्ग और ताश खेलते बच्चे दिखे। पूछने पर एक बच्चे ने बताया कि घर भले ही छोटा है, लेकिन कलर टीवी और कूलर है। यही हाल भिखारियों की हर बस्ती का है।

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