राजधानी लखनऊ के प्रमुख चौराहों से लेकर मॉल्स व पार्कों के बाहर हाथ फैलाकर दो निवालों के लिए चंद पैसे मांगने वाले भिखारियों की एक अजब दुनिया है। असंगठित दिखने वाले इन भिखारियों की अपनी बस्ती है और खास नियम-कानून भी। कहीं इनके मुखिया को दादा तो कहीं कप्तान कहा जाता है। बस्तियां अपने मुखिया के इशारे पर ही चलती हैं। इनकी बस्तियां चिनहट की बलरामनगर, अलीगंज, निशातगंज और सदर की डेरा बस्ती के अलावा शहर के कई अन्य स्थानों पर भी हैं। यही दादा भिखारियों की टोलियां और शिफ्ट बनाते हैं।
भिखारियों का कार्पोरेट कल्चर: 15 दिनों में बदल जाती है शिफ्ट, हर बस्ती का होता है एक दादा, घरों में टीवी-कूलर सबकुछ
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सुबह सात बजते ही निकल पड़ते हैं भिखारी
बलरामनगर स्थित भिखारियों की बस्ती के संकरे रास्ते के मुहाने पर सुबह छह बजते ही टैंपो व ई-रिक्शा खड़े दिखाई देते हैं। पता चला कि ये वाहन भिखारियों को दूरदराज चौराहों तक ले जाने के लिए आए हैं। इसी तरह से अलग-अलग बस्तियों से प्रमुख चौराहों तक भिखारी पहुंचाए जाते हैं और शाम को वापसी भी करते हैं।
अंग्रेजी दिलाती है भीख की मोटी रकम
बलरामनगर बस्ती के भिखारी अतर सिंह ने बताया कि कुछ एनजीओ वाले पढ़ाने आते हैं, उनसे बच्चों को अंग्रेजी सीखने पर जोर दिया जाता है। उनकी बस्ती में करीब 50 घर हैं और आबादी करीब 500 है। इनमें करीब 200 महिलाएं, 150 बच्चे व शेष पुरुष हैं। पुरुष शहर के अलावा अयोध्या, मथुरा, काशी और आगरा जैसे उन शहरों में भी जाते हैं, जहां विदेशी पर्यटकों से मोटी भीख मिलने की उम्मीद रहती है। यहां अंग्रेजी की जरूरत पड़ती है। वहीं, दूसरे भिखारी गोरखनाथ ने बताया कि बस्ती के ज्यादातर पुरुष बाहर गए हैं और दिनभर पर्यटन व धार्मिक स्थलों पर भीख मांगते हैं। सभी त्योहार में लौटेंगे और तब हिसाब होगा। वहीं, शहर में भीख का हिसाब रोज होता है।
हर 15 दिन में बदलती है शिफ्ट
फूलमती ने बताया कि वो पहले पॉलीटेक्निक पर भीख मांगती थीं, अब बटलर चौराहे पर घूम-घूमकर भीख मांगती हैं। बस्ती के बड़े लोग ऐसा करने को कहते हैं क्योंकि एक बार लोग पहचान जाएं तो भीख नहीं देते। वह निशातगंज से बच्चे के साथ ही आती हैं। उसके बेटे ने बताया कि वह सुबह टैंपो से मां संग निकलता है और शाम को बस्ती लौटता है।
कलर टीवी-कूलर व अन्य सामान
सदर इलाके की डेरा बस्ती में इतनी संकरी गलियां हैं कि पैदल चलकर ही निकला जा सकता है। इन गलियों में दिन में नशे करते युवा, बुजुर्ग और ताश खेलते बच्चे दिखे। पूछने पर एक बच्चे ने बताया कि घर भले ही छोटा है, लेकिन कलर टीवी और कूलर है। यही हाल भिखारियों की हर बस्ती का है।