कोरोनावायरस का ओमिक्रॉन वैरिएंट दुनियाभर के लिए मुसीबतों का कारण बना हुआ है। अगस्त-सितंबर के महीने में जहां एक बार ऐसा लगने लगा था कि वायरस अब निष्क्रिय हो गया है, वहीं यह नया वैरिएंट पहले की तुलना में काफी तेजी से लोगों को संक्रमित कर रहा है। विशेषज्ञों के कहना है कि एशियाई देशों में जिस तरह से यह वैरिएंट तेजी से बढ़ता जा रहा है, यह निश्चित ही चिंताजनक स्थिति है। अगले 2-3 महीने काफी महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं, सभी देशों को ओमिक्रॉन की रफ्तार को रोकने के लिए सख्ती से कदम उठाने की आवश्यकता है।
बड़ी कामयाबी: ओमिक्रॉन ही नहीं, कोरोना के आने वाले वैरिएंट्स को भी बेअसर कर सकती है यह तकनीक, जानिए विस्तार से
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
खास एंटीबॉडी की पहचान
नेचर जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बताया कि जिस एंटीबॉडी की पहचान की गई है वह कोरोनावायरस के तमाम वैरिएंट्स के उस हिस्से को लक्षित करके उसे बेअसर कर सकती है जो वायरस के म्यूटेशन के दौरान सामान्यतौर पर परिवर्तित नहीं होते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस शोध के आधार पर वैक्सीन और एंटीबॉडी उपचार को डिजाइन करने में मदद मिल सकती है, जो न केवल ओमिक्रॉन बल्कि भविष्य में उभरने वाले अन्य वैरिएंट्स के खिलाफ भी प्रभावी होंगे।
क्या कहते हैं अध्ययनकर्ता?
यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन स्कूल ऑफ मेडिसिन में एसोसिएट प्रोफेसर डेविड वेस्लर कहते हैं, इस अध्ययन के दौरान हमने पाया कि वायरस के स्पाइक प्रोटीन के साइटों को लक्षित करने वाले एंटीबॉडीज को टारगेट करके इसको बढ़ने से रोकने में सफलता मिल सकती है। जैसा कि ओमिक्रॉन वैरिएंट के स्पाइक प्रोटीन में करीब 37 म्यूटेशनों के बारे में पता चला है, जोकि इसे अत्यधिक संक्रामक और मानव कोशिकाओं में आसानी से प्रवेश करने के योग्य बनाता है।
अध्ययन में क्या पता चला?
अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने सबसे पहले यह जानने की कोशिश की, कोशिकाओं की सतह पर प्रोटीन के अच्छी तरह से बाइंडिंग में अलग-अलग वैरिएंट के स्पाइक प्रोटीन कितने सक्षम हो सकते हैं? इस प्रोटीन को एंजियोटेंसिन कनवर्टिंग एंजाइम -2 (एसीई 2) रिसेप्टर कहा जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि महामारी की शुरुआत में सामने आए वायरस में पाए जाने वाले स्पाइक प्रोटीन की तुलना में ओमिक्रॉन वैरिएंट के स्पाइक प्रोटीन इसके 2.4 गुना बेहतर ढंग से बाइंडिंग में सक्षम थे। जिसका मतलब है कि कोरोना का यह नया रूप अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
बूस्टर डोज को लेकर दिया गया जोर
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि कोरोना के पहले के स्ट्रेनों से संक्रमित रह चुके और वैक्सीनेशन करा चुके लोग, दोनों में ही संक्रमण को रोकने की क्षमता कम हो गई थी। इस आधार पर प्रोफेसर डेविड वेस्लर कहते हैं, ओमिक्रॉन संक्रमण से बचाव के लिए वैक्सीन की तीसरी खुराक वास्तव में मददगार हो सकती है। सभी देशों को इस बारे में विचार करने की आवश्यकता है।
----------------
नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से प्राप्त जानकारियों आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।