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बड़ी चिंता: जेल कैदियों में इस गंभीर रोग का खतरा पांच गुना अधिक, फिर कैसे पूरा होगा भारत सरकार का लक्ष्य?

Mon, 10 Jul 2023 04:07 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Mon, 10 Jul 2023 04:07 PM IST
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Prisoners in India are five times more at risk of developing Tuberculosis TB, know its risk factors in hindi
कैदियों में बढ़ते टीबी के मामले - फोटो : iStock

भारत के जेलों में बंद कैदियों में सामान्य आबादी की तुलना में तपेदिक (टीबी) रोग विकसित होने का खतरा पांच गुना अधिक है, द लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित अध्ययन की इस रिपोर्ट ने कई प्रकार के सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत सरकार, प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत साल 2025 तक भारत से टीबी उन्मूलन के लक्ष्य पर काम कर रही है पर असलियत में यह लक्ष्य काफी कठिन मालूम होता है



दुनियाभर की जेलों में संचारी रोगों की व्यापकता का आकलन करने के लिए अपनी तरह के इस पहले अध्ययन की रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। अध्ययनकर्ताओं ने कहा है कि भारतीय जेलों में बंद हर एक लाख कैदियों में से करीब 1,076 टीबी के शिकार हैं। वहीं डब्ल्यूएचओ टीबी रिपोर्ट 2022 के अनुसार, सामान्य आबादी में, प्रति एक लाख की जनसंख्या पर टीबी के मामले सिर्फ 210 हैं।

इसका मतलब है कि कैदियों में इस गंभीर और जानलेवा रोग का खतरा सामान्य आबादी से करीब पांच गुना अधिक हो सकता है। 

Prisoners in India are five times more at risk of developing Tuberculosis TB, know its risk factors in hindi
टीबी के मामले - फोटो : Pixabay

दुनियाभर के जेलों में बढ़ता टीबी का खतरा

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 193 देशों की जेलों में बंद कैदियों के बीच टीबी के जोखिमों का आकलन किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि 2019 में वैश्विक स्तर पर जेलों में बंद लगभग 11 मिलियन (1.1 करोड़) लोगों में से लगभग 125,105 में टीबी का खतरा था। यह दर प्रति एक लाख लोगों में 1,148 मामलों के बराबर की है। वहीं सामान्य आबादी में यह आंकड़ा 127 के करीब का है। 

इस अध्ययन में पाया गया कि वैश्विक स्तर पर जेलों में कैदियों में टीबी के निदान की दर 53 फीसदी ही है। 

Prisoners in India are five times more at risk of developing Tuberculosis TB, know its risk factors in hindi
टीबी के जोखिमों के बारे में जानिए - फोटो : iStock

क्यों बढ़ रहे हैं मामले?

शोधकर्ताओं ने कैदियों में बढ़ते टीबी के मामलों के लिए जेलों में बढ़ी भीड़ को प्रमुख कारण पाया है। कैदियों में इस रोग के खतरे को लेकर पहले के अध्ययनों में भी चिंता जताई जाती रही है। इसी से संबंधित  साल 2017 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंफेक्शियस डिजीज में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि जेलों में टीबी के निदान और उपचार के मामले क्रमश: 18% और 54% हैं। केवल आधे जेलों में ही प्रवेश के दौरान कैदियों में टीबी की जांच की जाती है।

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टीबी के बढ़ते जोखिमों को लेकर अलर्ट - फोटो : iStock

क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ?

अमेरिका के बोस्टन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रोफेसर और अध्ययन प्रमुख लियोनार्डो मार्टिनेज कहते हैं, जेलों में भीड़भाड़ और वेंटिलेशन की समस्या के कारण टीबी के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इस बढ़ते स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर विशेष सावधानी बरतते रहने की आवश्यकता है। इसके अलावा जेल में बंद लोगों में टीबी के साथ मधुमेह, शराब के सेवन से होने वाले विकार, धूम्रपान और अल्पपोषण के कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं का भी खतरा अधिक हो सकता है। 

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देश को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य - फोटो : Pixabay

टीबी उन्मूलन के लक्ष्य पर काम कर रही है भारत सरकार

ये आंकड़े भारत के लिए और भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। भारत सरकार साल 2025 तक देश को टीबी मुक्त करने के लक्ष्य के साथ काम कर रही है। ऐसे में कैदियों में बढ़ते टीबी के मामले इस लक्ष्य को पूरा करने में बाधा बन सकते हैं। टीबी को लेकर पहले के अध्ययनों में भी इस लक्ष्य पर सवाल उठाए जाते रहे हैं।

पीएमसी जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 में हर साल जहां टीबी के 256 नए मामले रिपोर्ट किए जाते थे, वह घटकर 2021 में 210 जरूर रह गया है, लेकिन देश को टीबी मुक्त बनाने के लक्ष्य से यह अब भी कहीं अधिक है। वैश्विक आंकड़ों की तुलना में भारत में अब भी टीबी के नए मामलों की संख्या अधिक है।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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