सुसाइड प्रिवेंशन: एआई चैटबॉट मानसिक रोगियों में बढ़ा रहा आत्महत्या के विचारों का खतरा? मनोचिकित्सकों का अलर्ट
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) चैटबॉट मानसिक तनाव, अकेलेपन और भावनात्मक परेशानियों में लोगों को तुरंत बातचीत का विकल्प दे रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एआई इंसानी सहानुभूति और पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य में मदद नहीं कर सकता है। कई बार भ्रम और भावनात्मक निर्भरता जैसी स्थितियां गंभीर नुकसान यहां तक कि आत्महत्या के विचारों को बढ़ाने वाली भी हो सकती हैं।
विस्तार
आत्महत्या यानी जानबूझकर अपना जीवन समाप्त करना, वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का कारण बना हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट पर नजर डालें तो पता चलता है कि दुनियाभर में हर साल 7.20 लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या कर रहे हैं। ये हर 100 मौतों में से लगभग 1 मौत के बराबर है। 15-29 वर्ष की आयु वाले युवाओं में आत्महत्या दुनियाभर में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण है, वहीं दुनियाभर में होने वाली सभी आत्महत्याओं में से आधे से अधिक (56%) 50 वर्ष से कम उम्र के लोगों में रिपोर्ट की जाती है।
आज विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस है, जो हर साल 10 सितंबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य समाज में मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या से जुड़ी गलतफहमियों को दूर करना तथा लोगों को यह बताना है कि मानसिक परेशानियों का समाधान संभव है। सरकारों, स्वास्थ्य संगठनों और आम लोगों को एक साथ लाकर आत्महत्या रोकथाम के लिए प्रभावी कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करना भी इसका लक्ष्य रहा है।
आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में पुरुषों की आत्महत्या से मौत की दर महिलाओं की तुलना में दोगुनी से अधिक है। पुरुषों में प्रति एक लाख पर 12.3 और महिलाओं में प्रति एक लाख पर औसतन 5.9 लोगों की मौत हो जाती है। आत्महत्या के ज्यादातर मामलों में विशेषज्ञ डिप्रेशन जैसी मेंटल हेल्थ की समस्याओं को कारण मानते हैं, जिसे समय रहते डॉक्टरी मदद से ठीक किया जा सकता था।
आत्महत्या के बढ़ते मामलों को लेकर एक अध्ययन की रिपोर्ट में पाया गया है कि जिस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को इस दुनिया के लिए वरदान के रूप में देखा जा रहा है, वह भी आत्महत्या के मामलों को अप्रत्यक्ष तौर पर बढ़ाने वाला हो सकती है।
एआई चैटबॉट्स से ले रहें हैं मेडिकल सलाह
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, एआई चैटबॉट्स पर हमारी निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। छोटी-मोटी जानकारियों से लेकर, दवाओं की पर्ची को समझने और एआई को अपने लक्षण बताकर खुद से समस्या के निदान की आदत लोगों में काफी बढ़ गई है। मानसिक रूप से परेशान होने पर भी अक्सर लोग एआई से मदद ले रहे हैं, 'मैं बहुत परेशान हूं, मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं'?
- कुछ ही सेकंड में एआई इसका जवाब भी दे देता है, बिना किसी सवाल के जैसे- आपने कितनी देर से खाना नहीं खाया, आपकी नींद कैसी है या कोई और दिक्कत तो नहीं है?
- चूंकि परेशान लोगों की बात एआई सुनता हुआ लगता है, जवाब देता है तो ये थोड़ा अच्छा महसूस करा सकता है।
- पर विशेषज्ञ कहते हैं, किसी भी स्वास्थ्य समस्या के निदान के लिए मरीज की हिस्ट्री, लाइफस्टाइल, खान-पान की आदत जैसे पहलुओं को समझना ज्यादा जरूरी है, जो एआई चैटबॉट नहीं करते हैं, वो बस सीधा जवाब देते हैं।
बहरहाल, यही सुविधा आज लाखों लोगों को एआई चैटबॉट की ओर खींच रही है। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग, डॉक्टरों और थेरेपिस्ट से मिलने में लगने वाला समय और अकेलेपन की बढ़ती समस्या के बीच एक ऐसा डिजिटल साथी, जो 24 घंटे उपलब्ध हो पहली नजर में बेहद आकर्षक विकल्प लगता है।
लेकिन सवाल यहीं स शुरू होता है-क्या किसी इंसान की मानसिक परेशानी को समझने के लिए केवल अच्छी बातचीत काफी है?
बीएमजे जर्नल में प्रकाशित अध्ययन की रिपोर्ट से पता चलता है कि ब्रिटेन में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दुनिया के अन्य देशों की स्थिति भी ऐसी ही है। दूसरी ओर, एआई चैटबॉट भी तेजी से लोगों की निजी और भावनात्मक जिंदगी में जगह बना रहे हैं।
- कुछ लोग उनसे तनाव, रिश्तों, अकेलेपन और उदासी पर बात कर रहे हैं, तो कुछ गंभीर मानसिक संकट के दौरान भी इन्हीं से जवाब मांग रहे हैं।
समस्या यह है कि एआई इंसान जैसे बात करता हुआ तो लग तो सकता है, लेकिन वह इंसान है नहीं। वह आपके लिए सहानुभूति भरे शब्द लिख सकता है, लेकिन क्या वह यह पहचान सकता है कि सामने वाला व्यक्ति केवल उदास है या उसकी स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि उसे तुरंत मदद की जरूरत है?
मेंटल हेल्थ समस्याओं में एआई की मदद
हाल के कुछ मामलों ने इसी सवाल को बेहद गंभीर बना दिया है। कुछ लोगों में आत्महत्या से जुड़े संकटों के दौरान भी चैटबॉट की प्रतिक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।
- ब्रिटेन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) के आंकड़ों के मुताबिक, हर पांच में से करीब एक वयस्क किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
- साल 1993 में 16-64 वर्ष की उम्र के 15.5 प्रतिशत लोगों में ऐसी समस्याएं थीं, जबकि 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 22.6 प्रतिशत हो गया।
- इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की मांग भी तेजी से बढ़ी है। 2016 के मुकाबले अब इन सेवाओं की मांग 21 प्रतिशत अधिक है।
इसी तरह 'द लैंसेट ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज' के एनालिसिस के अनुसार, भारत में 1990 से 2023 के बीच एंग्जायटी डिसऑर्डर (चिंता संबंधी विकार) के मामलों में 123.5% की बढ़ोतरी हुई। वहीं 1990 में प्रति एक लाख आबादी पर डिप्रेशन के लगभग 2,147 मामले थे, जो 2023 तक बढ़कर 2,800 हो गए। गंभीर डिप्रेशन के मामले आत्महत्या को बढ़ाने वाले हो सकते हैं।
हाल के वर्षों में ऐसे मामलों में मदद के लिए लोग एआई की ओर ज्यादा भाग रहे हैं। पिछले करीब तीन वर्षों में जनरेटिव एआई चैटबॉट जो इंसानों की तरह बातचीत कर सकते हैं, तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। ये 24 घंटे उपलब्ध रहता है, थकता नहीं, बातचीत करने वाले को लगातार सहारा देने वाला जवाब देता है और बार-बार एक ही बात सुनने में भी अधीर नहीं होता।
लेकिन अब चिंता बढ़ रही है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खुद इलाज करने के लिए चैटबॉट का इस्तेमाल कहीं समस्या का समाधान बनने के बजाय खुद एक नई समस्या तो नहीं बन रहा?
समस्या कितनी बड़ी है?
अमेरिका में कई किशोरों की मौत आत्महत्या से हुई है। इनमें 16 वर्षीय एडम रेन और 14 वर्षीय स्वेल सिटजर भी शामिल हैं। उनके माता-पिता ने बाद में आरोप लगाया कि बच्चों की मानसिक स्थिति सुधारने में एआई चैटबॉट मददगार साबित नहीं हुए। उनका आरोप है कि इन चैटबॉट से हुई बातचीत ने उनके बच्चों की आत्महत्या से जुड़े विचारों को और बढ़ाया।
- एक अन्य हालिया मामले में 56 वर्षीय व्यक्ति पर आरोप है कि उन्होंने अपनी मां की हत्या करने के बाद खुद भी जान दे दी। बताया गया कि एआई चैटबॉट से हुई बातचीत के दौरान बढ़ता हुआ उनका शक और भ्रम यानी पैरानॉयड सोच इस पूरी स्थिति के लिए जिम्मेदार था।
ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें लोगों ने एआई चैटबॉट के साथ बातचीत के दौरान ऐसी बातों पर विश्वास करना शुरू कर दिया जो वास्तविकता से जुड़ी नहीं थीं। इसे भ्रम या डिल्यूजन कहा जाता है, यानी व्यक्ति किसी गलत या असंभव विचार को भी पूरी तरह सच मानने लगे।
क्या कहते हैं दुनियाभर के मनोचिकित्सक?
- ब्रिटिश साइकोलॉजिकल सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. रोमन रैक्जका कहते हैं-
एआई निश्चित ही समाज के लिए बहुत से फायदे लेकर आ सकता है, लेकिन इसे मानसिक स्वास्थ्य के लिए डॉक्टरी मदद की जगह पर इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। चैटबॉट जैसे टूल उन लोगों की मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में मदद के लिए इस्तेमाल किए जाने चाहिए, जिन्हें इसकी जरूरत है, न कि डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक या दूसरे प्रशिक्षित विशेषज्ञों के विकल्प के रूप में।
- एनएचएस इंग्लैंड की पूर्व मानसिक स्वास्थ्य निदेशक क्लेयर मर्डोक कहती हैं-
एआई प्लेटफॉर्म्स पर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सलाह या थेरेपी के लिए निर्भर नहीं होना चाहिए। जिन लोगों को वास्तविक मानसिक स्वास्थ्य सहायता की जरूरत है, उनके लिए चैटबॉट कई बार नुकसानदायक हो सकते हैं, क्योंकि ये आपको समय पर मनोचिकित्सकों तक पहुंचने ही नहीं देते।
- एआई को रिलेशनशिप थेरेपिस्ट के रूप में इस्तेमाल किए जाने को लेकर अध्ययन करने वाली रोहैम्पटन विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की सहायक प्रोफेसर लाउरा वोल्स कहती हैं-
आई अब हमारे बीच है और यह कहीं जाने वाला नहीं है। इसलिए चुनौती यह नहीं है कि एआई को पूरी तरह रोक दिया जाए। असली चुनौती यह है कि इसे सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल करने का रास्ता निकाला जाए। इसके लिए एआई कंपनियों की भूमिका के साथ-साथ आम लोगों को भी यह समझाना जरूरी होगा कि चैटबॉट क्या कर सकता है और उसकी सीमाएं क्या हैं?
मानसिक स्वास्थ्य के मामले में एआई चैटबॉट को कारगर क्यों नहीं माना जा सकता?
वैज्ञानिकों का कहना है कि एआई चैटबॉट इस तरह बनाए गए हैं कि वे इंसानों की तरह बातचीत करके उन्हें सहारा देते हुए नजर आएं। लेकिन असल में वे इंसानी बातचीत की केवल नकल करते हैं। उनके पास इंसानों जैसी वास्तविक और अनुभव पर आधारित सहानुभूति नहीं होती।'
भोपाल स्थित वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं-
एआई बातचीत के जरिए व्यक्ति को जुड़ाव का एहसास तो हो सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि उसके पीछे वास्तविक मानवीय संबंध या समझ मौजूद हो। इसे एक तरह का ‘कनेक्शन का भ्रम’ कहा जा सकता है। परेशान व्यक्ति को लगता है कि सामने वाला उसे पूरी तरह समझ रहा है, जबकि वास्तव में वह एक एआई सिस्टम से बात कर रहा होता है। मानसिक परेशानी की गंभीर स्थिति में यह भ्रम खतरनाक हो सकता है और आत्महत्या तक के मामलों को बढ़ा सकता है। डिप्रेशन जैसे मामलों में समय रहते डॉक्टरी मदद आत्मघाती विचारों को कम करने में मददगार हो सकती है, पर एआई चैटबॉट से सलाह लेते रहना आपको समय पर डॉक्टरी मदद के लिए जाने से रोक सकता है।
चैटबॉट बनाने वाली कंपनियां भी जानती हैं ये बात
एआई चैटबॉट बनाने वाली कंपनियां भी इन चिंताओं को समझती हैं और उनका कहना है कि वे जोखिम कम करने के लिए कदम उठा रही हैं।
- अगस्त में ओपनएआई ने स्वीकार किया कि चैटजीपीटी को इस तरह तैयार किया गया है कि वह बातचीत में तथ्यों और वास्तविकता पर आधारित जवाब दे। इसके बावजूद कुछ मामलों में एआई मॉडल भ्रम पैदा कर सकता है।
इसके कुछ सप्ताह बाद आपेनएआई ने बताया कि वह 30 से अधिक देशों के 90 से ज्यादा डॉक्टरों के साथ काम कर रहा है। कंपनी मानसिक स्वास्थ्य, बच्चों और युवाओं के विकास पर अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का एक सलाहकार समूह भी बना रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एआई लोगों की मदद करे, उन्हें नुकसान न पहुंचाए।
अगर कोई व्यक्ति बातचीत के दौरान आत्महत्या करने की इच्छा जाहिर करता है, तो एआई ऐसे लोगों को तुरंत मनोवैज्ञानिक सलाह के लिए भेजना चाहिए।
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स्रोत:
AI driven psychosis and suicide are on the rise, but what happens if we turn the chatbots off?
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