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अमर उजाला विशेष: जानिए पांच डॉक्टरों की कहानियां, जिन्होंने कोरोना काल में असंभव को भी संभव बना दिया

Abhilash Srivastava अभिलाष श्रीवास्तव
Updated Thu, 01 Jul 2021 02:16 PM IST
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national doctors day 2021, Know how was the corona period for doctor's
डॉक्टर्स डे 2021: विशेष - फोटो : Social media

कोरोना की विपरीत परिस्थितियों से भरा पिछले डेढ़ साल से ज्यादा का समय दुनियाभर के लिए कितनी मुसीबतें लेकर आया, यह अब बताने का विषय नहीं रहा है, हम-आप, सब भली भांति इससे वाकिफ हैं। एक समय तो ऐसा था जब लोगों के लिए अपनी जान बचाना, प्राथमिकता बन गई थी। सौभाग्य से हम उस दौर से काफी हद तक बाहर आ गए हैं। हम सब आज सही सलामत और स्वस्थ हैं तो यह सिर्फ दो शक्तियों की वजह से, पहला- वह अदृश्य शक्ति जो इस सृष्टि को चला रही है और दूसरी वह शक्ति जिसने अपनी जानपर खेलकर कोरोना संक्रमितों की जान बचाई- हमारे डॉक्टर्स। नेशनल डॉक्टर्स डे- एक खास दिन है जिसमें हम उन सभी डॉक्टरों को शुक्रिया कह सकें, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से एक नहीं दो-दो बार देश को कोरोना के संकट से बाहर निकाला है। अमर उजाला, देश के सभी डॉक्टर्स को उनके जज्बे और कर्तव्यनिष्ठा के लिए सलाम करता है।


नेशनल डॉक्टर्स डे की इस विशेष रिपोर्ट में आइए देश के ऐसे ही कुछ डॉक्टर्स से कोरोना काल के उनके अनुभवों को जानने की कोशिश करते हैं। कैसे रहा उनके लिए कोरोना का समय, कैसे उन्होंने रोगियों की सेवा की, उन्हें नई जिंदगी दी और कोरोना काल में ऐसा क्या हुआ जो उन्हें हमेशा याद रहेगा? 
किसी ने बचाए 93 साल की बुजुर्ग के प्राण तो किसी ने युवा जिंदगी को लौटाया मौत के मुंह से, पढ़े जाबांज़ डॉक्टरों की अनोखी कहानियां-

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डॉ शुचिन बजाज - फोटो : Self
''कोरोना ऐसी मुसीबतें लेकर आया जो कभी किसी ने सोचा ही नहीं था''

डॉ शुचिन बजाज
निदेशक, उजाला सिग्नस हॉस्पिटल्स


कोरोना काल के अपने अनुभवों को साझा करते हुए डॉ शुचिन बताते हैं, मैनें अपने जीवन में कभी ऐसी कल्पना भी नहीं की थी, जो समस्याएं हमें इस कोरोनाकाल में झेलने पड़ी हैं। विशेषकर दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी, हताश लोगों के लगातार कॉल आते रहना और इन सबके बीच एक अदृश्य दुश्मन से हमारा मुकाबला। परिस्थितियां भले ही कठिन थीं, लेकिन हमें उम्मीद थी कि हमारी लगन और मेहनत के सामने कोरोना बहुत ज्यादा हावी नहीं हो पाएगा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे लिए यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। कोरोना की चौतरफा नकारात्मक परिस्थितियों के बीच खुद को सकारात्मक रखते हुए रोगियों की जान बचाने की कोशिश करते रहना, कठिन काम था। हमें उन सभी डॉक्टर्स का हमेशा शुक्रगुजार रहना चाहिए।
डॉ शुचिन बताते हैं, कई डॉक्टर्स जो कोरोना से खुद संक्रमित होकर अस्पताल में भर्ती थे, वह अपने साथ के बेड़ों पर भर्ती रोगियों की मदद भी कर रहे थे। इन सबके बीच कई साथियों के परिवार के लोगों की इस कोरोना के समय में मृत्यु हो गई, कुछ लोग अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए, कुछ हुए भी तो एकदिन में सारी रीति-रिवाजों को करके अगले दिन फिर से रोगियों की सेवा में लग गए। यह जो जज्बा है, शायद ईश्वर हमें अलग से देता है।
रोगियों  के साथ के अनुभव के बारे में डॉ शुचिन बताते हैं, कोरोना के समय में कई ऐसे रोगियों को देखा जो एकदम से ठीक हो गए थे लेकिन बाद में कुछ जटिलताओं के चलते उनकी जान नहीं बचाई जा सकी, जबकि हमारे पास एक 93 साल की बुजुर्ग महिला आई थीं, जिन्हें कई अस्पतालों ने जवाब दे दिया था, लेकिन हम उनकी जान बचाने में सफल रहे, वह खुद के पैरों पर चलकर अस्पताल से वापस गईं। ऐसे ही एक रोगी आए और उन्होंने चिट्ठी दिखाते हुए बताया कि मैं हाईकोर्ट का जज बन गया हूं, हम सबने कहा ये तो बहुत अच्छा है, पार्टी दीजिए। उन्होंने कहा यह सब किस काम का मैं तो जिंदा ही नहीं बचूंगा, हालांकि वह बाद में ठीक हो कर वापस गए।
नेशनल डॉक्टर्स डे पर डॉ शुचिन कहते हैं, लोगों की जान बचाना ही हमारा पेशा है, हमें ईश्वर ने इसीलिए बनाया है। मुझे गर्व है कि मैं लोगों की जान बचाने, उन्हें नई जिंदगी देने के पेशे में हूं, इससे ज्यादा और क्या चाहिए? 
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डॉ विक्रमजीत - फोटो : Self
''मरीजों की जान बार-बार यमराज से खींच कर लाते रहे, बिना थके-बिना हारे''

डॉ विक्रमजीत सिंह
(डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेल मेडिसिन)
आकाश हेल्थकेयर, दिल्ली


''मैं 21 साल से डॉक्टरी पेशे में हूं, कई महामारियों के बारे में पढ़ा और देखा है, लेकिन जैसा कोरोना का समय रहा, वैसा न पहले कभी देखा, न ही कभी ऐसे किसी महामारी के बारे में सोचा था''।  कोरोना काल पर अपने अनुभवों को साझा करते हुए डॉक्टर विक्रमजीत कहते हैं- यह समय ऐसा था जैसे हम एक किला पकड़कर बैठे हों और चौरतरफा हमपर हमला हो रहा हो। फिर भी हमने अपना किला नहीं छोड़ा। हमारी मेहनत और ऊपर वाले की मेहर रंग लाई और फिलहाल हम एक गंभीर दौर से काफी हद तक बाहर आ गए हैं।
डॉक्टर विक्रजीत कहते हैं, कोरोना बहुत चुनौतीपूर्ण समय रहा है। हम-हमारा परिवार सबपर खतरा था, लेकिन अस्पताल में पहुंचते ही, यह सारी बातें जैसे भूल सी जाती रही हो, ध्यान में रहते थे तो वह सभी मरीज जिनकी जान बचाना हमारा पहला काम था। कई बार हम असफल हुए, कई बार हमें उन लोगों की जान बचाने में भी कामयाबी मिली जिनका बचना लगभग मुश्किल लग रहा था। मरीज ठीक होकर जाते तो अजब सी राहत मिलती, वहीं जब हम रोगियों की जान बचाने में असफल रहते तो दिल पर बहुत चोट महसूस होती थी। सबसे बड़ी बात हमने दूसरी लहर में कई जवान जिंदगियों को बचाया है, उन्हें याद करते ही कोरोना का सारा दर्द दूर हो जाता है। विफलताओं से सफलताएं ज्यादा मिलीं, यह सबसे सुकून देने वाली बात रही।  डॉ विक्रमजीत कहते हैं, कई बार रात के समय मैं नींद से जग जाता और घंटों सोचते रहता, कोरोना कितनी जानें ले रहा है? फिर अगले दिन सुबह उठकर पीपीई किट पहनकर रोगियों की सेवा में लग जाता। पीपीई किट पहनकर रखना भी अपने आप में किसी गंभीर चुनौती से कम नहीं था।
रोगियों के साथ का अनुभव साझा करते हुए डॉ विक्रमजीत बताते हैं, हमारे पास एक मरीज आया जिसे पहले कोरोना के चलते अस्पताल में भर्ती किया गया, बाद में उसे हार्ट-अटैक आ गया। हम सभी डॉक्टर्स ने मिलकर उससे रोगी को बचाया। इसके बाद उसे ब्लैक फंगस का संक्रमण हो गया, हम फिर लग गए और उस समस्या से भी मरीज को ठीक करके ही दम लिया, यह वाक्या मुझे हमेशा याद रहेगा, जहां हम शायद सीधे यमराज से उसकी जान बार-बार खींच कर ला रहे थे।
नेशनल डॉक्टर्स डे पर डॉ विक्रमजीत कहते हैं, मुझे इस बात का बेहद खुद है कि कुछ लोग हम डॉक्टर्स की मेहनत को कमतर साबित करने में लग जाते हैं, जगह-जगह डॉक्टरों का पीटा जाना, उनके साथ बदतमीजी करना ,बहुत दुख देता है। हमारी हमेशा कोशिश रहती है कि कुछ भी हो जाए मरीज की जान नहीं जानी चाहिए, लोगों को इस बात को समझना चाहिए। हम भी इंसान ही हैं और अपनी कोशिश करते हैं, पर ईश्वर का लिखा तो नहीं बदल सकते।
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डॉ सत्यकांत त्रिवेदी - फोटो : Self

''...जब मदद के लिए पाकिस्तान से आया फोन''

डॉ सत्यकांत त्रिवेदी
मनोरोग विशेषज्ञ
बंसल हॉस्पिटल, भोपाल


''जीवन में कभी कोरोना जैसी अजीबो-गरीब और विकट समस्या का सामना करना पड़ेगा, इस बारे में सोचा नहीं था', बस यह समय जितनी जल्दी हो सके, बीत जाए'' 
पेशे से मानसिक रोगों का इलाज करने वाले डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं, पिछले डेढ़ साल का समय ऐसा रहा है जिसमें वह सारी चीजें देख लीं जो कभी सिर्फ किताबों में पढ़ा करते थे। कोरोना ने शरीर के साथ लोगों के मस्तिष्क पर भी काफी बुरा असर डाला है। यह ऐसा दौर था जिसमें कभी-कभी लोगों को कुछ समझ ही नहीं आता था कि अब आगे क्या होने वाला है? चारों तरफ अनिश्चितता और नकारात्मकता का माहौल हावी था, ऐसे में लोगों में चिंता, भय और तनाव जैसी समस्याओं का होना काफी स्वाभाविक है। डॉ सत्यकांत बताते हैं, मैं पिछले कई वर्षों से आत्महत्या के खिलाफ अभियान चला रहा हूं, अब तक के पूरे कार्यकाल में ऐसी विकट समस्याएं पहले कभी नहीं देखी थीं, जो इस कोरोना में सामने आई। मानसिक रोग से ग्रसित मरीजों की संख्या, कई गुना तक बढ़ गई है, आने वाले कई साल यह परेशानी बनी रहने की आशंका है। कोरोना काल में कई मरीज ऐसे आते जिन्हें करोना के कोई लक्षण नहीं थे, पर उनमें बीमारी को लेकर इतना डर था, कि वह बिल्कुल ना-उम्मीद से हो गए थे। पर इन सभी निराशाओं के बीच अच्छी बात यह रही कि हम डॉक्टर्स ने अपनी मेहनत और लगन से कोरोना को दो बार हराया है। इतना ही नहीं कोरोना जितनी बार आएगा, हम उसे जीतने नहीं देंगे।
एक घटना की जिक्र करते हुए डॉ सत्यकांत बताते हैं, कोरोना के समय में मुझे पाकिस्तान से एक मरीज का फोन आया। वह हाइपोकॉन्ड्रियासिस से पीड़ित था, ऐसी समस्या कोरोना जैसी महामारी के दौरान और भी बदतर हो जाती है। बतौर चिकित्सक यह मेरा फर्ज था कि मैं उसकी समस्या को ठीक करूं। गाइडलाइन्स के अनुसार मैंने अपने चिकित्सीय कर्तव्य का निर्वहन किया। चिकित्सक के लिए उसका काम केवल रोगियों को किसी भी स्थिति में ठीक करना होता है, बिना किसी बंदिश की परवाह किए। मैंने सीमापार भी लोगों की मदद की, यह मेरे लिए आंतरिक शान्ति देने वाली घटना रही है।
नेशनल डॉक्टर्स डे पर डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं, कोरोना का यह विकट समय आज नहीं तो कल खत्म हो जाएगा। लोगों की मदद कीजिए, एक दूसरे का सहारा बनिए। हम साथ-साथ इस महामारी से लड़ेंगे तो इससे हारने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है।

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डॉ वसीम गौहरी - फोटो : Self

"हमारी मेहनत, कोरोना को बार-बार हराती रहेगी,  पर हम न हारे हैं- न हारेंगे"

डॉ वसीम गौहरी
डायबिटोलॉजिस्ट, मुंबई


डॉ वसीम गौहरी बताते हैं, कोरोना का समय एक साथ इतनी दिक्कतें लेकर आएगा, इस बारे में कभी किसी ने सोचा भी नहीं था। हम डॉक्टर्स लोगों की जान बचाते हैं, पर इस दौरान मैंने अपने परिवार के लोगों को अपने सामने दुनिया छोड़ते देखा है। मेरी चाची को डायबिटीज की बीमारी थी। संपूर्ण लॉकडॉउन के दौरान उनकी तबियत ज्यादा खराब हो गई, वह कोमा जैसी स्थिति में पहुंच गईं। जिस अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था, वहां कोरोना के मरीज ज्यादा पाए गए और अस्पताल को कुछ दिनों के लिए पूरी तरह से बंद हो गया। काफी कोशिशों के बाद भी उनका इलाज नहीं हो पा रहा था जिससे उनकी हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही थी। थक हार के उनका इलाज कर रहे डॉक्टर ने कहा, 'वसीम लेट हर डाई पीसफुली'। मैं खुद एक डॉक्टर हूं, और अपने सामने ही अपनी चाची को इलाज के अभाव में कैसे मरने दूं? मेरे दिमाग में उस समय क्या चल रहा था वह सिर्फ मैं जानता हूं। मैंने कैसे भी करके उन्हें एक हॉस्पिटल के आईसीयू में भर्ती कराया लेकिन समस्या यहां खत्म नहीं हुई। हॉस्पिटल के लोगों ने कहा इनका कोविड टेस्ट नहीं हुआ है, हम इन्हें अस्पताल में रखेंगे और यदि इनको कोरोना हुआ तो अस्पताल बंद करना पड़ जाएगा। हमने फिर चाची को आईसीयू से निकालकर कोविड टेस्ट कराया, दो दिन के इंतजार के बाद रिपोर्ट आई। हमने फिर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया, 14 दिनों तक वह आईसीयू में रहीं, स्थिति में सुधार हुआ तो हम उन्हें वापस घर पर लेकर आए। हालांकि वह ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह सकीं।
यह कहानी इसलिए लोगों को जानना जरूरी है क्योंकि हम डॉक्टर्स की जिंदगी भी बहुत असामान्य रही है, कोरोना के समय में। आपका पेशा लोगों की जान बचाना हो और आपके परिवार का ही कोई इलाज के लिए तड़प रहा हो, वह दर्द और उस मानसिक स्थिति को झेलना आसान नहीं होता है, एक समय आप असहाय महसूस करने लगते हैं, बेबसी से बड़ी कोई पीड़ा नहीं है।
डॉ वसीम बताते हैं, हमारे अस्पताल में यूके, दुबई और अन्य कई देशों के मरीज भी इलाज के लिए आते रहते हैं। लॉकडाउन के समय में उनके इलाज की व्यवस्था करना, दवाइयां उपलब्ध कराना भी हमारा ही काम था। सार के तौर पर देखें तो यह पूरे डेढ़ साल का समय मुसीबतों का पहाड़ था, जिसे हम डॉक्टर्स ने अपनी मेहनत से तोड़कर स्थिति को दोबारा से सामान्य करने की कोशिश की है। हमारे लिए रोगियों की जान बचाना प्राथमिकता है, इसके लिए हमें कितनी भी कोशिश करनी पड़े, न हम डॉक्टर्स कभी पीछे हटे हैं, न हटेंगे।

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