कोरोना वायरस के दो नए वैरिएंट मिलने के बाद एक बार फिर दुनियाभर में चिंता है। वैज्ञानिक ये पता लगाने में जुटे हैं कि क्या ये वैरिएंट ज्यादा संक्रामक हैं और क्या कोविड वैक्सीन इन पर काम करेगी? सभी वायरस प्राकृतिक तौर पर म्यूटेट करते हैं यानी अपनी संरचना में बदलाव करते हैं। उसी तरह सार्स-कोव-2 भी करता है। अनुमानित तौर पर एक महीने में एक या दो बदलाव। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में पैथोजन इवोल्यूशन की विशेषज्ञ डॉक्टर लूसी वैन डॉर्प कहती हैं, 'अक्सर म्यूटेशन की वजह से वायरस की प्रॉपर्टी पर कम असर पड़ता है। सार्स-कोव-2 के जीनोम में ज्यादातर म्यूटेशन यात्री की तरह हैं, यानी वे वायरस का व्यवहार नहीं बदलते, वे बस साथ चलते रहते हैं।' लेकिन कभी-कभी वायरस इस तरह म्यूटेट कर जाता है, जिससे उसके जीवित रहने और प्रजनन की क्षमता को मदद मिलती है। अब ये जानने की कोशिश हो रही है कि क्या नए ब्रिटिश वैरिएंट में भी यही हुआ है जो तेजी से फैलता नजर आ रहा है।
Coronavirus: वायरस कैसे होता है म्यूटेट? जानिए इसके बारे में सबकुछ
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म्यूटेशन की प्रक्रिया
एक ऐसा ही लेकिन इससे नहीं जुड़ा एक वैरिएंट दक्षिण अफ्रीका में भी सामने आया है। चिंता की बात ये है कि दोनों ही म्यूटेशन स्पाइक प्रोटीन के जीन में हुए हैं। इसी स्पाइक प्रोटीन के जरिए वायरस मानव कोशिका से चिपक कर दाखिल होता है। ब्रिटेन वाले वैरिएंट में 14 म्यूटेशन हुए हैं, जिससे प्रोटीन बनाने वाले एमिनो एसिड में बदलाव आया और जेनेटिक कोड में कुछ हिस्से खत्म हो गए जिसे डिलीशन कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, इसमें से कुछ म्यूटेशन वायरस फैलने की गति को भी प्रभावित कर सकतेेे हैं।
कई वैरिएंट में स्पाइक प्रोटीन एन-510वाई में म्यूटेशन पाया गया है, दक्षिण अफ्रीका वाले एक वैरिएंट में भी। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के मुताबिक, लैब प्रयोग ये सुझा रहे हैं कि शायद ये म्यूटेशन वायरस को मानव कोशिका से जुड़ने में मदद कर सकतेेे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, एक और स्पाइक प्रोटीन पी-681एच में म्यूटेशन महत्वपूर्ण हो सकता है। इस प्रोटीन में 69-70 पोजीशन पर जो डिलीशन हुई, उसका संबंध कमजोर इम्यून सिस्टम वाले मरीजों से भी जोड़ा गया जिनके अंदर कई महीनों तक वायरस रहता है। इस डिलीशन की वजह से हमें पता चल सकता है कि वैरिएंट कैसे बना। शायद उस मरीज में जिसका इम्यून सिस्टम कमजोर था, जो वायरस से नहीं लड़ पाया और इस वजह से कई महीनों तक वायरस उसके शरीर में रहा और साथ-साथ म्यूटेट करता रहा।
यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो के प्रोफेसर डेविड रॉबर्टसन ब्रिटेन के उस ग्रुप का हिस्सा हैं, जिसने नए वैरिएंट का आकलन किया है। प्रोफेसर रॉबर्टसन बताते हैं, 'फिलहाल सोच ये है कि वायरस लंबे संक्रमण के दौरान कई म्यूटेशन से बना है।' हालांकि मिंक जानवर के साथ किसी तरह का संबंध नजर नहीं आ रहा। प्रोफ़ेसर रॉबर्टसन कहते हैं, 'अभी ऐसा कोई सबूत नहीं कि मिंक या कोई और जानवर का इससे संबंध है, लेकिन समझदारी इसी में है कि इसे पूरी तरह से खारिज ना किया जाए।