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Covid-19: संक्रमण से ठीक होने के महीनों बाद भी हो सकती है ब्लड क्लॉटिंग की दिक्कत, विशेषज्ञों ने ऐसे लक्षणों को लेकर किया सावधान

Thu, 14 Apr 2022 02:04 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Thu, 14 Apr 2022 02:04 PM IST
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blood clotting after covid recovery, risk for deep vein thrombosis in long covid
लॉन्ग कोविड में बढ़ी रक्त के थक्के बनने की समस्या - फोटो : Pixabay

कोरोना संक्रमण ने पिछले दो वर्षों में वैश्विक स्तर पर हम सभी को कई तरह से परेशान किया है। कुछ वैरिएंट्स ने जहां फेफड़े और हृदय को गंभीर क्षति पहुंचाई, वहीं कुछ को अत्याधिक संक्रामक माना जा रहा है। संक्रमण से ठीक होने के लंबे समय, यहां तक कि कुछ मामलों में एक साल बाद तक भी लोगों में लॉन्ग कोविड की समस्या देखी जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कोरोना वायरस का संक्रमण और इसके दीर्घकालिक दुष्प्रभाव, दोनों ही शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं, ऐसे में हम सभी को इससे बचाव के निरंतर उपायों को प्रयोग में लाते रहने की आवश्यकता है।



संक्रमण के दीर्घकालिक प्रभावों और इसकी गंभीरता को जानने के लिए अध्ययन कर रही वैज्ञानिकों की एक टीम ने अपने हालिया अध्ययन में बड़ा खुलासा किया है। जर्नल बीएमजे में प्रकाशित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि कई लोगों में संक्रमण से ठीक होने के लंबे समय बाद तक भी गंभीर समस्याएं देखी जा रही है। इतना ही नहीं, कुछ लोगों में रिपोर्ट निगेटिव आने के महीनों बाद रक्त के थक्के बनने की समस्या देखी गई है। ब्लड क्लॉटिंग एक गंभीर समस्या है, जिसके कारण शरीर के अंगों को क्षति होने का खतरा हो सकता है। संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों को इस बारे में विशेष सावधानी बरतते रहने की आवश्यकता है। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

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ब्लड क्लॉटिंग की समस्या देखने को मिली - फोटो : Pixabay

लॉन्ग कोविड में डीप वेन थ्रॉम्बोसिस का खतरा
स्वीडिश वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में बताया गया है कि कुछ लोगों में संक्रमण से ठीक होने के तीन महीने तक डीप वेन थ्रॉम्बोसिस का खतरा देखा गया है। इस स्थिति में शरीर की एक या अधिक नसों में रक्त का थक्का (थ्रोम्बस) बनने लगता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि संक्रमण से ठीक होने के छह महीने बाद तक लोगों में डीप वेन थ्रॉम्बोसिस, पल्मोनरी एम्बोलिज्म और इंटर्नल ब्लीडिंग जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। इनका समय पर निदान और इलाज बहुत आवश्यक माना जाता है।

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फेफड़ों की धमनियों में रुकावट - फोटो : Pixabay

अध्ययन में क्या पता चला?
स्वीडन स्थित उमेया यूनिवर्सिटी में क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजी विभाग की प्रोफेसर ऐनी-मैरी फ़ोर्स कोनोली के नेतृत्व में 10.57 लाख से अधिक लोगों पर यह अध्ययन किया गया था। इन लोगों को फरवरी 2020 से लेकर मई 2021 के बीच कोरोनोवायरस से संक्रमित पाया गया था। शोधकर्ताओं ने कई स्तर और मापदंडों पर किए गए इस शोध में पाया कि पुरुष प्रतिभागियों में पल्मोनरी एम्बोलिज्म का खतरा अधिक होता है। यह स्थिति फेफड़ों की धमनियों में रुकावट का कारण बन सकती है। 

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धमनियों में रुकावट का खतरा - फोटो : iStock

पुरुष प्रतिभागियों में जोखिम अधिक
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि कोविड-19 से ठीक होने के बाद पहले तीन महीनों के दौरान, महिला प्रतिभागियों की तुलना में पुरुष प्रतिभागियों में धमनियों में रुकावट का खतरा अधिक पाया गया। कोविड की पहली लहर के दौरान संक्रमित रह चुके वृद्ध लोगों में रक्तस्राव की घटनाएं भी अधिक देखने को मिली हैं। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि रक्तस्राव के कारण वैसे तो कोई गंभीर स्वास्थ्य जोखिम नहीं देखा गया है, हालांकि इससे कुछ स्थितियों में खतरा जरूर हो सकता है। 

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डीप वेन थ्रॉम्बोसिस के मामले - फोटो : Getty Images

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
प्रमुख अध्ययनकर्ता प्रोफेसर ऐनी-मैरी बताती हैं, कोविड-19 से ठीक होने के बाद कई लोगों में पहले तीन महीनों में डीप वेन थ्रॉम्बोसिस के मामले देखे गए हैं। खास बात यह है कि इसका खतरा अधिक उम्र वाले लोगों में ज्यादा पाया गया है। इसके अलावा कोरोना की दूसरी और तीसरी लहरों की तुलना में पहली लहर के दौरान संक्रमित रहे लोगों में इसका जोखिम अधिक पाया देखा जा रहा है। लॉन्ग कोविड के ऐसे लक्षण, कुछ स्थितियों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण भी बन सकते हैं। 

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