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कोरोना के संक्रमण से सुरक्षा देने के लिए वैक्सीनेशन को सबसे प्रभावी उपाय के रूप में देखा जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक वैक्सीन लगने के बाद शरीर में बनी एंटीबॉडीज न सिर्फ कोरोना वायरस से सुरक्षा देती हैं, साथ ही यदि किसी को संक्रमण हो भी गया तो उसे गंभीर स्थिति से बचा सकती हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ रिपोर्ट में विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीनेशन के बाद हर व्यक्ति के शरीर में बनीं एंटीबॉडीज की मात्रा भिन्न हो सकती है। ऐसे में लोग यह जानना चाह रहे हैं कि टीकाकरण के बाद उनके शरीर में बनी एंटीबॉडीज की मात्रा कितनी है और अब वह कितने सुरक्षित हैं ?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो परीक्षणों में पाया गया है कि वैक्सीन सभी लोगों पर प्रभावी है। हालांकि इससे शरीर में कितनी मात्रा में एंटीबॉडीज बनी हैं, इसकी जांच के लिए एंटीबॉडी टेस्ट की मांग बढ़ी है। सरकार की तरफ से फिलहाल इस संबंध में कोई दिशानिर्देश जारी नहीं किया गया है। आइए इस लेख में जानते हैं क्या एंटीबॉडीज टेस्ट से यह पता किया जा सकता है कि वैक्सीन ठीक से काम कर रही है या नहीं? क्या यह परीक्षण कराना सही है?
विशेषज्ञ से जानिए: क्या एंटीबॉडी टेस्ट से जान सकते हैं शरीर में वैक्सीन का असर? कितना कारगर है यह परीक्षण?
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क्या है एंटाबॉडी टेस्ट?
एंटाबॉडी टेस्ट (सीरोलॉजी टेस्ट) से प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा बनाए गए इम्युनोग्लोबुलिन जी और इम्युनोग्लोबुलिन जी एंटीबॉडीज का पता लगाया जा सकता है। सामान्य तौर पर इस टेस्ट का उपयोग कोविड-19 के पिछले संक्रमण और शरीर में उससे बनी एंटीबॉडीज का पता लगाने के लिए किया जाता है। हालांकि पिछले दिनों एंटीबॉडीज टेस्ट की मांग तेजी से बढ़ी है। लोग टीकाकरण से पहले और बाद इस टेस्ट को कराके वैक्सीन की शरीर में प्रभाविकता के बारे में जानना चाह रहे हैं।
कैसे किया जाता है यह परीक्षण?
डॉक्टर बताते हैं कि एंटीबॉडी परीक्षण करने के लिए ब्लड सैंपल लिया जाता है। सैंपल के परीक्षण के आधार पर इसका निर्धारण होता है। हालांकि एंटीबॉडी टेस्ट और टीकाकरण के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। इसके आधार पर प्रतिरक्षा-एंटीबॉडी के स्तर को निर्धारित करने में मदद मिल सकती है। इसीलिए लोग यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि उनको लगी वैक्सीन ठीक से काम कर रही है या नहीं?
वायरस के बदलते रूप ने बढ़ा दी है लोगों की चिंता
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि हाल में कई ऐसी रिपोर्ट्स आई हैं जिनमें कहा जा रहा है कि वायरस में म्यूटेशन के साथ कोरोना के नए-नए वेरिएंट्स सामने आ रहे हैं। कुछ नए प्रकार के वेरिएंट्स एंटीबॉडीज की भी चकमा दे सकते हैं। ऐसें में लोग इस टेस्ट के माध्यम से सुरक्षा के स्तर की जांच करना चाह रहे हैं। हालांकि टीकाकरण के मामले में इस परीक्षण को लेकर विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। इस तरह के परीक्षण को लेकर अंधाधुंध मांग का बढ़ना सही नहीं है। वैक्सीन संक्रमण से सुरक्षा देने के लिए काफी है।
क्या इस टेस्ट से लाभ हैं?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक एंटीबॉडीज टेस्ट के अपने लाभ और सीमाएं हैं, एक आकार सभा के लिए फिट हो यह जरूरी नहीं है। कोविड संक्रमण होने या वैक्सीन लगवाने के बाद एंटीबॉडीज बनने में 10-14 दिन का समय लग सकता है। समय से पहले परीक्षण करवाना लेने से गलत परिणाम मिल सकते हैं। दूसरा, एंटीबॉडी टेस्ट, वैक्सीन-जनित एंटीबॉडी का पता लगाने का कोई मान्य तरीका नहीं है। एंटीबॉडीज तमाम कारकों पर निर्भर करती है, ऐसे में हो सकता है कि इस परीक्षण के बाद आपको सटीक विवरण न मिल सके।
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नोट: यह लेख अमर उजाला से एक बातचीत के दौरान फेलिक्स हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉ डीके गुप्ता द्वारा बताए सुझावों के आधार पर तैयार किया गया है। डॉ डीके गुप्ता को कोरोना रोगियों के इलाज का अनुभव है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।