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सपनों और फिल्मों में दिखने वाले नजारे जी सकते हैं आप भी, रोमांच से भरा लद्दाख का चादर ट्रैक

Mon, 24 Dec 2018 01:11 PM IST
Trainee au entertainment न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: Trainee au entertainment Updated Mon, 24 Dec 2018 01:11 PM IST
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trekking at chadar trek in leh-ladakh region jammu kashmir
leh ladakh - फोटो : अमर उजाला
बर्फ से लकदक पहाड़। शीशे जैसी बर्फ की चादर पर चलना। सिर उठाकर देखो तो मानो आसमान इतना करीब, जितना कभी नहीं था। चादर ट्रैक की खूबसूरती को बयां करने के लिए शायद इससे बेहतर शब्द नहीं होंगे। जम चुकी जंस्कार नदी पर बर्फ की चादर ने इस ट्रैक को चादर ट्रैक का नाम दिया है। 


बेशक कश्मीर धरती का स्वर्ग है, लेकिन लद्दाख की खूबसूरती को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता। यहां की हसीन वादियों में कई ऐसी जगह हैं, जो दुनिया भर से हर साल लाखों लोगों को यहां खींच लाती हैं। वैसे तो लद्दाख में अधिकांश पर्यटक जुलाई से सितंबर माह के बीच पहुंचते हैं, लेकिन जो लोग निर्धारित रूट से हटकर और विपरीत मौसम में रोमांच का अनुभव करते हैं, उन्हें बर्फ की चादर बिछने का इंतजार रहता है। 

जनवरी में लद्दाख के जंस्कार का चादर ट्रैक आकर्षण का केंद्र बनता है। यहां देश के साथ-साथ विदेशों से भी पर्यटक जमे हुए झरनों और जंस्कार नदी पर जमी बर्फ पर चलने का रोमांचक अनुभव लेने पहुंचते हैं। चादर ट्रैक को भारत के सबसे अनूठे और चुनौतीपूर्ण ट्रैक में से एक माना जाता है। आमतौर पर छह से आठ दिन का यह ट्रैक जनवरी माह के अंत से फरवरी माह के अंत और कभी-कभी मौसम अनुकूल रहने पर मार्च तक भी जारी रहता है। 
trekking at chadar trek in leh-ladakh region jammu kashmir
leh ladakh - फोटो : अमर उजाला
स्थानीय लोग बताते हैं कि चादर ट्रैक सदियों से स्थानीय लोगों द्वारा खानपान की व्यवस्था और व्यापार के लिए प्रयोग में लाया जाता रहा है। बर्फबारी के बाद जब लेह से जंस्कार कट जाता है, तो यह पुराना ट्रैक ही जोड़े रखता है। पल-पल बदलता मौसम हो या फिर टूटती-बनती नदी पर जमी बर्फ, इस मार्ग पर जोखिम बढ़ा देते हैं। एक ओर चट्टानें तो दूसरी ओर नदी पर जमीं बर्फ पर कभी भी पैर फिसलने का डर भी होता है।

ट्रैकिंग के दौरान बर्फ पर पैर फिसलने से नदी में धंसने का भी खतरा बना रहता है। लेकिन रोमांच प्रेमी इस सबकी परवाह किए बिना जीवन के अभूतपूर्व अनुभव हासिल करने पहुंचते हैं। वहां न तो मोबाइल का नेटवर्क होता है और न ही संपर्क का कोई दूसरा साधन।  
 
trekking at chadar trek in leh-ladakh region jammu kashmir
leh ladakh - फोटो : अमर उजाला
दिन 1- हवाई जहाज से लेह पहुंचें
ऊंचाई 11,400 फुट

आकर्षण का केंद्र नेरक का झरना

स्थानीय लोगों के अनुसार नेरक शब्द दरअसल नर्क शब्द से लिया गया है। चूंकि चादर ट्रैक का नेरक तक सफर जिंदगी और मौत के बीच का है। ऐसे में स्थानीय लोग इस पड़ाव को नेरक के नाम से जानते हैं। लेकिन नेरक जितना डरावना है, उतना ही खूबसूरत भी है। यहां के जमे झरनों को देखकर किसी दूसरी दुनिया में होने का अहसास होता है।  
 
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leh ladakh - फोटो : अमर उजाला
दिन 2- चिलिंग से होते हुए गाड़ी के जरिए 65 किलोमीटर का तिलत सुमडो तक सफर
ऊंचाई - 11400 से 10390 फुट
रात टेंट में गुजारें

यह सामान पास होना जरूरी

ट्रैकर्स को गाइड कई तरह की सलाह देते हैं। इनमें 50-60 किलो का बैक पैक, रेन कवर, एनर्जी बार, ओआरएस, व्यक्तिगत टार्च, एक लीटर की बॉटल, दो ट्रैक पेंट (पूरी लंबाई की), थर्मल इनर, दो ट्रैक टी शर्ट, ऊनी स्वेटर और जैकेट के अलावा दो वाटर प्रूफ हैंड गल्वस, ऊनी मोजे, टायलेट पेपर, तौलिया, सन ग्लासेज, सन स्क्रीन लोशन और लिप गार्ड के साथ-साथ ट्रैकिंग के लिए मेडिकल किट और वॉकिंग स्टिक रखना जरूरी है। ट्रैकिंग पर जाने से पूर्व डाक्टरी सलाह जरूरी है। 
 
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leh ladakh - फोटो : अमर उजाला
दिन 3- तिलत सुमडो से शिंगारा कोमा तक 10 किलोमीटर ट्रेकिंग
ऊंचाई-10390 से 10550 फुट
रात टेंट में ही गुजारें


 
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