आतंकी तंजीमों के शीर्ष कमांडरों के सफाए और लगातार ध्वस्त हो रहे नेटवर्क से बौखलाए आतंकी नेताओं की हत्याओं करने पर आमादा हो गए हैं। कश्मीर घाटी में आतंकवाद के शुरुआती दिनों से लेकर हाल के वर्षों तक ज्यादातर सियासी हत्याएं चुनावी वर्ष में हुई हैं लेकिन आतंकी वारदातों का ऐसा सिलसिला अब बिना चुनाव के भी तेज हो गया है।
जम्हूरियत की मजबूती से खौफ में आतंकी, अजय पंडिता से लेकर वसीम बारी की हत्या के पीछे ये है वजह
एक महीने में चार हत्याएं हो चुकी हैं। भाजपा के बांदीपोरा जिलाध्यक्ष और उनके दो परिजनों की हत्या से एक माह पूर्व आठ जून को अनंतनाग में कांग्रेस नेता और सरपंच अजय पंडिता की हत्या कर दी गई थी।
घाटी में जम्हूरियत की मजबूती में जुटे नेताओं, कार्यकर्ताओं से लेकर पंचायती नुमाइंदों पर पहले भी आतंकी हमले होते रहे हैं। 2011 से अब तक 19 पंचायती नुमाइंदों की हत्या की जा चुकी है। वहीं, वर्ष 1990 से 2009 तक 587 सियासी लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
चुनावी वर्ष में सबसे ज्यादा घटनाएं रिपोर्ट हुईं। सर्वाधिक राजनीतिक हत्याएं चुनावी वर्ष 2002 में हुई थीं। इसके अलावा चुनावी वर्ष 1996 में 75, 1998 में 45, 1999 में 53 और 2004 में 60 राजनीतिक हत्याएं हुईं।
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जमीनी स्तर पर सियासी गतिविधियां आतंकियों से बर्दाश्त नहीं हो रही हैं। एक माह में चार हत्याएं दर्शाती हैं कि जम्हूरियत की मजबूती में जुटे लोग आतंकियों के निशाने पर हैं। 2011 से अब तक 19 पंचायती नुमाइंदे हमलों में मारे गए हैं। पंचायती जन प्रतिनिधियों की सुरक्षा का प्रस्ताव एडीजीपी सुरक्षा के पास लंबित है। जम्हूरियत के लिए जान दांव पर लगाने वालों को तत्काल सुरक्षा दी जानी चाहिए।
-अनिल शर्मा, अध्यक्ष, ऑल जम्मू-कश्मीर पंचायत कांफ्रेंसयह भी पढ़ेंः जम्मू-कश्मीर में पांच अगस्त से पहले हो सकता है बड़ा हमला, पाकिस्तान ने रची साजिश, निशाने पर ये लोग
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