नाडीमर्ग नरसंहार की कहानी इकलौते चश्मदीद की जुबानी
चुन्नी लाल रैणा। उम्र करीब 80 साल। 23 मार्च 2003 को कश्मीर के पुलवामा जिले के नाडीमर्ग में हुए भीषण नरसंहार में जीवित बचे इकलौते चश्मदीद। आज भी तेरह साल पहले की वह खौफनाक रात याद कर डर दहशत और दर्द से सिहर उठते हैं।
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शरीर पर जख्मों के निशान और दिल में कभी न मिटने वाली कसक लिए बस एक ही सवाल सालों से पूछ रहे हैं कि हमारा कसूर क्या था? किस जुर्म की सजा मिली। दर्द की ऐसी ही लहर हर उस कश्मीरी पंडित के सीने में रह-रहकर उठती है जिसे आतंकियों की वहशत की बदौलत बेघर होना पड़ा और अपनों को खोना पड़ा।
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विस्थापन की चौथाई सदी गुजर जाने के बाद भी उनके हिस्से का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा। चुन्नी जब कांपती आवाज में यह बताते हैं कि नाडीमर्ग में किस तरह आतंकियों ने महिलाओं और मासूम बच्चों समेत 25 लोगों को कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया था, तो कलेजा कांप उठता है।
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उन 25 लोगों में से 24 की मौके पर ही मौत हो गई थी। केवल चुन्नी लाल किस्मत के धनी रहे। हालांकि गोलियां उन्हें भी लगी थीं। चुन्नी अब पुरखू में विस्थापित शिविर में जिंदगी की शाम काट रहे हैं। चुन्नी बताते हैं कि कश्मीर में 1989-90 में आतंकवाद चरम पर आते ही कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम शुरू हो गया।
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बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित जान बचाकर घाटी से पलायन कर गए। फिर भी नाडीमर्ग में कश्मीरी पंडितों के दस परिवार वहीं बने रहे। समय गुजरता गया 23 मार्च, 2003 को गांव में दिन के समय आतंकी देखे गए। इसकी सूचना पुलिस को दी गई, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। रात को हथियारों से लैस आतंकी गांव में पहुंच गए। घर में उनके साथ पत्नी चांद रानी और बेटा दीप कुमार था।