पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव के बीच स्थानीय बाशिंदों को इस बार स्थायी हल की आस भी बंधी हुई है। शनिवार को सुबह से ही चुशुल से सटे मोलदो बॉर्डर पर्सनल मीटिंग प्वाइंट पर शीर्ष कमांडरों की बैठक पर सभी की निगाहें टिकी रहीं।
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लद्दाख
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सुबह बैठक शुरू होने की खबर पर टकटकी रही तो शाम तक बैठक के नतीजे की सूचना लेने के लिए एलएसी से सटे ग्रामीण रेडियो और टेलीविजन पर राहत की खबर का इंतजार करते रहे। सरहद का अग्रिम इलाका होने की वजह से यहां मोबाइल सिग्नल नहीं है। ऐसे में इन अग्रिम इलाकों के ग्रामीणों का संचार नेटवर्क टीवी-रेडियो तक सीमित है।
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लद्दाख
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लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद लेह के चुशुल क्षेत्र से एग्जिक्यूटिव काउंसलर कुनचोक स्टैंजिन ने कहा कि अग्रिम इलाकों में दो दर्जन गांवों की आबादी के लिए यह बैठक बेहद अहम है। इन गांवों का जीवन पशुपालन पर निर्भर है और सर्दियों में मुख्य चरागाह एलएसी पर हैं। इलाके में तनाव के चलते ग्रामीण सहमे जरूर हैं लेकिन उन्हें आस भी है कि इस बार स्थायी हल निकलेगा।
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लद्दाख
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एलएसी पर चीन की चाल को लद्दाखी बेबाकी से बयां करते हैं। लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रिंचन नामग्याल और अंजुमन इमामिया लेह के अध्यक्ष अशरफ अली कहते हैं, ‘एलएसी पर हमारे चरवाहों की आवाजाही पर पाबंदियां हैं, जबकि चीन अपने चरवाहों को जमीन कब्जाने के इरादे से आगे भेजता है।’
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सांकेतिक तस्वीर
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लेह के एक अन्य प्रतिनिधि ने बताया कि डेमचौक का दुमचेले क्षेत्र चुशुल व इससे सटे इलाकों का सबसे बड़ा चरागाह है, जो अब चीनी सेना की वजह से आवाजाही के लिए बंद है। इसी तरह एलएसी के कई अन्य इलाकों में भी चीन ने पहले अपने चरवाहे भेजे और इसके अगले साल सेना की गश्त शुरू कर दी। एलएसी पर लद्दाख के चरवाहों की गतिविधियां भी बढ़ानी होंगी।