हम इसी तरह अपनों की लाशें ढोते रहेंगे। चाहें पाकिस्तान, चीन या कोई और भी मुल्क आ जाए, हम अपनी सरहद, अपनी जमीन, अपना वतन छोड़कर नहीं जाएंगे। यह कहना है गांव करमाड़ा के 78 वर्षीय चौधरी मोहम्मद फजल का। जोकि गांव में शुक्रवार रात पाकिस्तानी गोलाबारी में मारे गए एक ही परिवार के तीन सदस्यों को अंतिम विदाई देने के बाद अमर उजाला के साथ अपने जज्बातों को उजागर कर रहे थे।
हम इसी तरह अपनों की लाशें ढोते रहेंगे, पर सरहद छोड़कर नहीं जाएंगे...रुला देगी ये दर्द भरी दास्तां
चौधरी मोहम्मद फजल का कहना है कि सत्तर वर्ष से हम लोग इसी तरह के दृश्य देेखते आ रहे हैं। शुक्रवार को एक परिवार के तीन लोग पाकिस्तानी गोलाबारी में मारे गए, इससे पहले एक बार सात लाशों को एक साथ हम ढो चुके हैं। हमने कभी हिम्मत नहीं हारी है, और न ही हारने वाले हैं।
फजल ने कहा कि पाकिस्तानी गोलाबारी से हमारे इस इलाके में अब तक कम से कम तीस लोग जान गंवा चुके हैं। दर्जनों लोग दिव्यांग होकर घरों में हैं। इसके बावजूद हमने कभी दुश्मन के आगे हार नहीं मानी है। न ही आगे कभी हार मानेंगे। हमें एक बात का अफसोस होता है कि जब नियंत्रण रेखा के लोगों के विकास और उत्थान की बात होती है तो वह हमारे लिए न होकर जम्मू, राजोरी, कश्मीर जैसे इलाके के लोगों के उत्थान की बात होती है।
कहा कि सरहद पर अपना खून हम बहाएं, हमारे बच्चे बहाएं और उसका फल और लोग पाएं। इससे बड़ा दुख हमारे लिए और क्या हो सकता है। पाकिस्तान तो हमारा दुश्मन है, लेकिन जो हमारे अपने हैं, जो हुकूमत में बैठे हैं, उन्हें भी हमारी चिंता नहीं होती है। आज सात दशक बाद भी हमारे गांव तक पक्की सड़क नहीं है।
उन्होंने कहा कि गोलाबारी में किसी के घायल हो जाने पर उसे कंधों पर उठाकर अस्पताल पहुंचाना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाता है। हमारी केंद्र सरकार के मांग है कि सरहद के इन बिना हथियार के रखवालों की तरफ ध्यान दें। इन्हें हर सुविधा दें ताकि ये और जोश से दुश्मन के मंसूबों को नाकाम बनाते रहें।
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