कश्मीर की विरासत को कायम रखने की कोशिश के चलते सोमवार को दीवान-ए-खास को लोगों के लिए खोल दिया गया। इसे 17वीं सदी में मुगल बादशाह जहांगीर ने शालीमार बाग में अपनी बेगम के लिए बनवाया था।
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दीवान-ए-खास
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घाटी के मुगल बागों में से एक मशहूर बाग शालीमार बाग के दीवान-ए-खास का कश्मीर की विरासत में अलग ही महत्व रहा है। यह बाग यूनेस्को की लिस्ट में भी दर्ज हे। 15 सालों में बने इस बाग के इस दीवान-ए-खास की मरम्मत कर इसे फिर से खोल दिया गया है। इसकी मरम्मत का काम इंटेक (इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज) ने जर्मनी के सहयोग से शुरू किया।
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Diwan-e-Khas
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जर्मनी के भारत में दूतावास डा. मार्टिन नेय ने दीवान-ए-ख़ास की पूर्वावस्था की प्राप्ति के पहले चरण का उद्घाटन किया किया। उनके समक्ष पीडीपी के नेता और शिक्षा मंत्री नईम अख्तर भी थे। उन्होंने इसे राज्य सरकार को सौंपा, जिसे लोगों के लिए खोल दिया गया।
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इस अवसर पर जर्मन दूतावास ने कहा कि हमारी काफी दिलचस्पी रहती है ऐसी ऐतिहासिक विरासतों में और जब हमें कहा गया, तो हमने इसे मंजूरी दी। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री महबूबा ने हमें एक और ऐसे ही विरासत की मरम्मत के बारे में बोला है, जिस पर हम विचार करेंगे।
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डा. मार्टिन नेय के अनुसार वर्ष 1981 से लेकर अब तक जर्मनी द्वारा करीब 400 करोड़ से अधिक राशि 144 देशों में किये गए 2650 ऐसे प्रोजेक्टों पर खर्च किए गए हैं। उनके अनुसार केवल भारत में ही 50 से अधिक ऐसे प्रोजेक्ट हैं।