महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले सत्तारुढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के दावों की पोल पूर्व की तरह इन उपचुनावों में भी खुल गई। दरअसल राजस्थान में होने जा रहे तीन महत्सवपूर्ण उपचुनावों के लिए दोनों ही पार्टियों ने किसी महिला उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा है। केवल बातों की राजनीति करने वाली इन दोनों पार्टियों ने हमेशा की तरह क्षेत्रवाद, जातिवाद और वंशवाद के आधार पर टिकिट दिए हैं।
यहां होने हैं तीन उपचुनाव
गौरतलब है कि अजमेर, अलवर लोकसभा व मांडलगढ़ विधानसभा उपचुनाव के लिए नामांकन का बुधवार को आखिरी दिन था। चुनाव आयोग की जानकारी के अनुसार नामांकन के अंतिम दिन तक तीन उपचुनावों के लिए कुल 62 उम्मीदवार मैदान में हैं। हालांकि नाम वापसी की तारीख 15 जनवरी है इसके बाद अंतिम लिस्ट जारी होगी।
18 लाख हैं महिला मतदाता
लेकिन विशेष बात यह है कि इन 62 उम्मीदवारों में महिला उम्मीदवारों की संख्या केवल चार है। जबकि अलवर लोकसभा उपचुनाव के लिए तो एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं है। इधर, अजमेर लोकसभा के लिए कुल तीन महिला उम्मीदवार जबकि मांडलगढ़ विधानसभा उपचुनाव के लिए एक महिला प्रत्याशी मैदान में हैं। जबकि इन तीनों उपचुनाव में करीब 18 लाख महिला मतदाता हैं।
महिला मुख्यमंत्री लेकिन विचार तक नहीं
राजस्थान में बीते चार वर्ष से कमान संभाले मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के अतिरिक्त और कई महिला नेतृत्व भाजपा सामने नहीं ला सकी है। तीन उपचुनाव के लिए प्रत्याशियों के नामों पर मंथन के दौरान भाजपा ने किसी महिला उम्मीदवार के नाम पर विचार तक नहीं किया। ऐसा ही कुछ कांग्रेस ने किया है। करीब 20 वर्ष तक कांग्रेस की अध्यक्ष रही सोनिया गांधी केवल महिला सशक्तिकरण बात करती रही लेकिन पार्टी ने महिला उम्मीदवारों पर कम ही भरोसा व्यक्त किया है।
बागी बढ़ा सकते है सिरदर्द
अलवर, अजमेर लोकसभा उपचुनाव व मांडलगढ़ विधानसभा उपचुनाव में करीब 40 लाख मतदाता उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। हालांकि मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। लेकिन अलवर लोकसभा से भाजपा के पूर्व प्रदेश महामंत्री और किसान नेता रामपाल जाट ने उम्मीदवार पेश कर भाजपा के लिए चिंता बढ़ा दी है। वहीं मांडलगढ़ विधानसभा में कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ गई है। क्योंकि यहां से पूर्व प्रधान गोपाल मालवीय ने पर्चा भरा है। वे लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े रहे है।