हरियाणवी गायन की संस्कृति को सहेजने और रागिनी कंपीटिशन को गांव के भीतर तक लाने वाले विख्यात गायक पालेराम दहिया का निधन हो गया। वह 68 वर्ष के थे। बुधवार तड़के उनके सीने में दर्द हुआ, जिसके चलते उन्हें दिल्ली के पूठ स्थित अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहां पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके पैतृक गांव सोनीपत के हलालपुर में उनका अंतिम संस्कार किया गया।
पालेराम दहिया का निधन: रागिनी को गांव के भीतर लाने वाले गायक थे, लोक गायन और हरियाणवी संस्कृति को जीवंत रखा
फेसबुक पर पालेराम दहिया के हरियाणवी रागिनी फैन पेज पर फॉलोअर्स की संख्या भी पांच हजार से अधिक है। उनकी गाई गई रागिनी बुरा मान चाहे भला मान, तू मारती कदे वो मारता, सर में भड़क आंख में पानी सहित अन्य ने साबित कर दिया कि वो भी किसी से कम नहीं हैं।
रागिनियों के साथ ही पालेराम दहिया अपने चुटकुलों से लोगों को गुदगुदाते थे। उनके चुटकुलों को सुनकर लोग लोटपोट हो जाते थे। उनकी अंतिम यात्रा रमेश कलाहवड़िया, सुरेश हडोली, अमित रोहणा, रणबीर बड़वासणी, सत्ते फरमाणा, नरेंद्र दांगी, नरेंद्र खरकराम, उत्तर प्रदेश से पैप्सी व संजय ठेकेदार सहित अन्य पहुंचे।
गांव में ले आए रागी की स्टेज
रागिनी में एक दौर ऐसा भी आ गया था कि स्टेज पर फूहड़ता हावी हो गई थी। लोग भी कहने लगे थे कि घड़वे वाले कुछ भी कह देते हैं, इन्हें गांव से बाहर ले जाओ। हालात ऐसे हो गए थे कि गांवों के अंदर रागिनी की स्टेज लगनी बंद हो गई थी। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। पालेराम दहिया गांव से बाहर हुई रागिनी की स्टेज को गांव के भीतर लेकर आए।
उन्होंने सामाजिक, देशभक्ति और देशहित की रागनियां गाईं। फूहड़ता से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। यही कारण था कि लोगों ने एक बार फिर से रागिनी की लगने वाली स्टेज को गांवों के भीतर जगह देने लगे इतना ही नहीं पालेराम दहिया को ब्याह-शादियों में भी रागिनी गाने के लिए बुलाया जाने लगा था। रागिनी गायक पालेराम दहिया ने अपनी रागिनियों के माध्यम से हरियाणवी संस्कृति को जीवंत रखने में अहम भूमिका निभाई।
पिता के गुजर जाने के बाद नहीं कर सके पढ़ाई
पालेराम ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया था। सन् 1967 में पिता के निधन के बाद वह अपनी पढ़ाई भी बीच में ही छोड़ दी। इस समय तक उन्होंने पांचवीं कक्षा ही पास की थी। गाने का शौक उन्हें स्टेज पर ले आया। उनकी दिली इच्छा थी कि हजारों की भीड़ के सामने खड़ा होकर गाऊं और लोग सुने। ऐसा दिन आया भी और इसके बाद उन्होंने मुड़कर पीछे नहीं देखा। कवि मेहर सिंह के साथ-साथ पंडित लख्मीचंद की लिखी रागिनियों को उन्होंने अपनी आवाज दी। टी-सीरीज में भी उन्होंने रिकार्डिंग की।
कुछ दिन रोडवेज विभाग में नौकरी की
पालेराम दहिया ने रागिनी गाने के दौरान हरियाणा रोडवेज विभाग में भी कुछ दिन तक नौकरी की, लेकिन रागिनी का शौक ही उनके लिए सबकुछ था। जिसके चलते उन्होंने कुछ महीने बाद ही नौकरी छोड़ दी। पालेराम की तीन बेटियां और दो बेटे हैं। उनका कहना था कि मां के बाद उन्हें उनके बच्चों ने भी खूब सपोट किया। वहीं गांव वालों ने भी उन्हें पूरा सहयोग दिया।
सामाजिक बातें कहने पर जुड़ा महाशय
पालेराम को महाशय पालेराम कहा जाने लगा था, जिसके पीछे की वह वजह बताया करते थे कि उन्होंने कभी फूहड़ता को स्टेज पर नहीं परोसा। उन्हें अपने व अपनी कला पर विश्वास था। यही कारण था कि उन्हें जनता ने खूब प्यार दिया। उत्तर प्रदेश में एक प्रतियोगिता के आयोजन के दौरान अन्य गायकों के मौजूद होने के बावजूद भीड़ ने उन्हें व मास्टर सतबीर को पूरी रात रागिनी गाने के लिए बोल दिया था। उन्हें खुद पर ही चुटकुले सुनाने के लिए जाना जाता था। जिस पर वह कहते थे कि जब लोगों का मनोरंजन ही करना है तो दूसरे पर छींटाकशी क्यों, अपने ऊपर ही कोई बात कह लेता हूं। ऐसे स्वभाव के चलते ही उन्हें महाशय पालेराम कहा जाने लगा था।