हाथी के हिंसक होने और तीन लोगों की जान लेने के मामले में वन विभाग, जिला प्रशासन, पुलिस और महायज्ञ के आयोजक सवालों के घेरे में हैं। चारों में से कोई भी कानूनी कार्रवाई के लिए इच्छुक क्यों नहीं है? यही नहीं, कोई यह बताने के लिए तैयार नहीं है कि हाथी का पालक कौन है? क्या हाथी को वैधानिक तरीके से पाला गया है? सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या हाथी के पालक को बचाने के लिए खामोशी की चादर ओढ़ी जा रही है?
हाथी के हिंसक होने का मामला: गजराज के पालक को बचाने के लिए ओढ़ ली गई खामोशी की चादर
वन विभाग के डीएफओ विकास यादव का कहना है कि जब हाथी हिंसक हुआ था तो उसके महावत की मदद से उसे नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। इसका मतलब है डीएफओ मान रहे हैं कि हाथी पालतू है। हाथी किसका है यह तो महावत को भी मालूम है, फिर विभाग यह क्यों नहीं पता कर पा रहा है कि हाथी किसका है? वन विभाग बृहस्पतिवार के हादसे के संबंध में बिना शिकायत कोई कार्रवाई नहीं कर सकता, तो इस पर तो कर ही सकता है कि बिना उसके लाइसेंस दिए और पंजीकरण कराए किसी ने जंगली जानवर को न केवल पाल रखा है, बल्कि उसे सार्वजनिक समारोहों में भी शामिल कर रहा है।
जिला प्रशासन भी खामोश है, जबकि उसके जिले में एक जानवर ने तीन लोगों की जान ले ली है। जानवर किसका है? उसे क्यों पाला गया? उसे सार्वजनिक समारोह में क्यों शामिल किया गया? यह सब जानना प्रशासन का काम है। प्रशासन की खामोशी चौंकाने वाली है और संदेह पैदा करती है।
यही नहीं यह कहा जा रहा है कि इसी हाथी ने साल 2020 में अपने महावत को मार डाला था। क्या इस बात से यज्ञ के आयोजन अंजान थे? यदि जानते थे तो ऐसे खतरनाक जानवर को इतने लोगों के बीच लाने का फैसला कैसे कर लिया गया? शायद सभी हाथी के पालक को जानते हैं, लेकिन उसे बचाने के लिए नाम नहीं लेना चाहते हैं। यही नहीं हाथी के पालक को बचाने में सभी खुद को भी बचा रहे हैं, क्योंकि यदि मामले की जांच होगी तो आंच सब पर आ सकती है।