सांप्रदायिक एकता के प्रतीक सद्गुरू कबीर स्थली मगहर के पूरब आमी नदी बहती है। आमी नदी मगहर नगर के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों के लिए जीवन दायिनी का रूप मानी जाती है। सद्गुरू कबीर इसे अमिया कहकर पुकारते थे। कबीर दर्शन को आने वाले श्रद्धालु आमी का जल भी प्रसाद स्वरूप अपने साथ ले जाते है।
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आमी नदी।
- फोटो : अमर उजाला।
कबीर स्थली को देखकर कवि की वह बेबाक पंक्तियां बरबस ही याद आ जाती हैं 'हम से तो अच्छी एक परिंदे की जात है, कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे'। कबीर की अमिया के बारे में संत डॉक्टर हरिशरण शास्त्री ने बताया कि एक बार मगहर व आसपास के क्षेत्रों में भयंकर सूखा पड़ा हुआ था। तब तत्कालीन नवाब बिजली खान पठान के आग्रह पर सद्गुरू कबीर मगहर आए थे।
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कबीर स्थली।
- फोटो : अमर उजाला।
जैसा कि इस दोहे से परिलक्षित होता है 'सूखी नदी में नीर बहाए, बिजली खान से चेताए'। सदगुरू की कृपा से यह सूखी पड़ी आमी नदी पुनः प्रवाहित हुई। इससे इलाका फिर से हरा भरा हो गया। जिसे श्रद्धालु दर्शन के बाद इसके जल को घर लेकर जाते हैं।
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आमी नदी के किनारे बना मस्जिद और मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला।
उन्होंने आगे कहा कि सद्गुरु कबीर ने भी पानी को जीवन का आधार मानते हुए कहा है कि 'रुखी सूखी खाय के ठंडा पानी पीयू' व 'सर्वर सर्वर संत जना चौथा बरसे मेह, परमारथ के कारने चारो धरि देह'। गुरु भक्ति को आमी जल से जोड़ते हुई कहा है कि 'गुरु दरियाव में नहाना हो, जासो दुर्मति भागे, जब लग गुरु दरियाव न पावे तब तक फिरत भुलाना हो'।
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आमी नदी के किनारे बना प्राचीन शिवमंदिर।
- फोटो : अमर उजाला।
आमी नदी तट पर बने प्राचीन शिवमंदिर के पंचवटी का जीणोद्धार दो दिसंबर 1933 में तत्कालीन गोरखपुर के कमिश्नर आरसीएएस होवर्ट ने कराया था। आमी नदी का जल यहां आने वाले श्रद्धालु शिव मंदिर में चढाते हैं और पूजन अर्चन करते है। आमी नदी तट पर बने प्राचीन मस्जिद के सामने बनी बौलिया में वजू करने के बाद श्रढ़ालु नमाज अदा करने के साथ ही सद्गुरु कबीर की मजार पर फातिहा भी पढ़ते हैं।