श्रीराम मंदिर आंदोलन के प्रसार में गोरखपुर की भूमिका अहम रही है। गोरखनाथ मंदिर ने इसे जन-जन तक पहुंचाने की अगुवाई की। जिस विश्व हिंदू परिषद ने आंदोलन की कमान संभाली, 1989 में इसका कार्यालय गोरखनाथ मंदिर परिसर में ही था। ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ आंदोलन को धार देने में लगे रहे। साल 1986 में विवादित स्थल का ताला खोलने की अनुमति गोरखपुर के ही जज कृष्णमोहन पांडेय ने दी थी।
गोरखपुर से बढ़ा राम जन्मभूमि आंदोलन, यहीं के जज ने खुलवाया था विवादित स्थल का ताला
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जगन्नाथपुर मोहल्ले में रहने वाले जज कृष्णमोहन पांडेय साल 1995 में सेवानिवृत्त हुए। उनके भतीजे सुजीत पांडेय बताते हैं, फैसले के पहले चाचा जी फैजाबाद से आते ही खुद को कमरे में बंद कर लेते थे और चार से पांच घंटे केस से संबंधित अध्ययन करते थे। अध्ययन में पाया कि राम मंदिर में ताला बंद करने का कभी कोई आदेश ही नहीं है। इसी को आधार बनाकर उन्होंने ताला खोलने का आदेश दिया।
सुजीत पांडेय कहते है कि मुझे याद है कि चाचाजी ने अपनी मां यानी मेरी दादी से एक दिन रात में कहा कि तुम सो जाओ, महत्वपूर्ण फैसला है, अगर हमको कुछ हो जाए तो चिंता मत करना। सेवानिवृत्त के बाद उन्होंने अपनी पुस्तक ‘अंतरात्मा की आवाज’ में इस बारे में बहुत विस्तार से लिखा। उनके फैसले को कभी उच्च न्यायालय ने भी खारिज नहीं किया। जिस दिन फैसला दे रहे थे कि कोर्ट के ऊपर एक बंदर आकर बैठ गया था। ऐतिहासिक फैसले के बाद सरकार ने उनका प्रमोशन रोक दिया।
बीजेपी की ओर से आया था ऑफर, ठुकरा दिया
सुजीत पांडेय बताते हैं, जब आडवाणी जी रथयात्रा निकाल रहे थे, उसमें डीजीपी श्रीचंद दीक्षित और कुछ बड़े अधिकारी शामिल हुए। भाजपा की ओर ऑफर आया कि आप भी शामिल हो जाइए, लेकिन चाचाजी ने ठुकरा दिया। साल 1999 में उनका निधन हो गया।
जुलूस निकाल रहे 30 बच्चे भी हुए थे गिरफ्तार, कैंट थाने में रखा गया
29 अक्तूबर 1990 को सुबह करीब 11 बजे थे। रामलला वाहिनी के बैनर तले अभिभावकों के संरक्षण में 30 बच्चे (उम्र पांच से 14 वर्ष) गोलघर चौराहे से जुलूस में निकले। मैं भी उनके साथ था। नारा लग रहा था, बच्चा-बच्चा राम का-जन्मभूमि के काम का। सरकार ने आंदोलन पर प्रतिबंध लगा रखा था। पीएससी और सीआरपीएफ के जवान मुस्तैद थे। इंदिरा बाल विहार के पास बच्चों को रोक लिया गया और उन्हें अभिभावकों के साथ गिरफ्तार कर एक बस में बैठा लिया गया। लगभग दो घंटे तक बच्चों को कैंट थाने में रखा गया।
रामलला वाहिनी संयोजक शंकर जोशी ने कहा कि उधर, शहर में यह खबर फैल चुकी थी, माहौल तनावपूर्ण होने लगा। धीरे-धीरे रामभक्तों का जमावड़ा होने लगा तो पुलिस ने बच्चों और अभिभावकों को बस में बैठाकर बेलीपार थाना भेज दिया। भूखे-प्यासे बच्चे दोपहर दो बजे बेलीपार पहुंचे। वहां मजिस्ट्रेट के सामने बच्चों को पेश किया गया, तो मजिस्ट्रेट ने बच्चों की गिरफ्तारी पर क्षोभ प्रकट किया और तत्काल गोरखपुर ले जाने का आदेश दिया। शाम पांच बजे सभी लोग इंदिरा बाल विहार पहुंचे, तब तक शहर में कर्फ्यू लग चुका था। यह मेरे और बच्चों के लिए अविस्मरणीय दिन था। राममंदिर आंदोलन में अपनी भूमिका निभाने वाले बच्चे रितु, श्रद्धा, चुन्नू, अतुल, प्रीति, राधा, रोहितशरण, ज्योति, राहुल, गोपाल गर्व से उस पल को याद करते हैं।