साल 1995 में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था लागू होने के बाद इस बार पहला अवसर है जब गोरखपुर जिला पंचायत अध्यक्ष का पद अनारक्षित है। अब तक अध्यक्ष की कुर्सी पर महिलाओं का कब्जा रहा है। भले ही सीट पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित रही हो, लेकिन इस पर कब्जा महिलाओं का ही रहा है। इस बार पहला मौका होगा, जब पुरुष भी जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी कर सकेगा।
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला।
पहले चुनाव में अध्यक्ष पद पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित था। भाजपा ने शोभा साहनी को मैदान में उतारा तो सपा की तरफ से भीम गुप्ता मैदान में थे। काफी सियासी तिकड़म भिड़ाई गई, लेकिन जीत शोभा साहनी को मिली थी। दूसरा चुनाव हुआ तो सपा की तरफ से पूर्व सांसद सुभावती पासवान मैदान में उतरीं। उस समय सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। सुभावती के मुकाबले भाजपा ने खजनी क्षेत्र की जिला पंचायत सदस्य रहीं अर्चना बेलदार को उतारा, लेकिन सुभावती चुनाव जीत गईं।
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तीसरा चुनाव जब हुआ तो उस समय प्रदेश में सपा की सरकार थी। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। सीट पिछड़ी महिला के लिए आरक्षित थी। सपा की तरफ से चिंता यादव को मैदान में उतारा गया। उनके मुकाबले सपा नेता राम नक्षत्र यादव की भयहू मैदान में उतारी गईं, लेकिन चिंता यादव चुनाव जीत गईं। हालांकि चिंता यादव ने पांच साल का कार्यकाल मुश्किल से ही पूरा किया था। इस चुनाव के दो साल बाद ही प्रदेश में बसपा की सरकार बन गई थी। बसपा सरकार में चिंता यादव का पावर तीन बार सीज किया गया था।
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पंचायत चुनाव
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चिंता यादव के बाद 2010 में चुनाव हुआ तो सीट महिला के लिए अनारक्षित थी। इस बार पूर्व मंत्री व कैंपियरगंज से भाजपा विधायक की पत्नी साधना सिंह ने अध्यक्ष के लिए दावेदारी कर दी। इस चुनाव में कोई मैदान में नहीं आया। लिहाजा साधना सिंह निर्विरोध चुन ली गईं। साधना का विरोध सपा के एक नेता ने खूब किया, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी।
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त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था का सबसे दिलचस्प चुनाव साल 2016 का रहा। इस बार सपा के दो प्रत्याशी आमने-सामने हो गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गीतांजलि यादव के नाम का एलान किया तो भाजपा विधायक रहते सपा का दामन थामने वाले विजय बहादुर यादव ने बगावत करके भाई को मैदान में उतार दिया। हालांकि चुनाव में सपा की गीतांजलि यादव को जीत मिली है। भाजपा सरकार रहते हुए भी गीतांजलि ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है।