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तस्वीरें: ट्रेन का ऐसा सफर, जिसमें स्टीमर की भी करनी पड़ती थी सवारी, पढ़िए ये रोचक कहानी

Sat, 05 Jun 2021 03:25 PM IST
vivek shukla राजन राय, गोरखपुर।
राजन राय, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 05 Jun 2021 03:25 PM IST
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special journey of train UP to bihar and Kolkata by steamer
NER - फोटो : अमर उजाला

बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि अंग्रेजों के समय देश में एक ऐसा भी रेल सफर था जिसमें नदी को पार करने के लिए स्टीमर की मदद ली जाती थी। नदी पार करने के बाद फिर से ट्रेन में बैठते थे। यह यात्रा एक किलोमीटर की होती थी। खास बात यह है कि यात्रियों को स्टीमर में भी उसी क्लास में बैठाया जाता था, जिस क्लास में उनका ट्रेन में आरक्षण होता था। दरअसल, यह यात्रा बिहार की थी। पूर्वोत्तर रेलवे का अधिकांश हिस्सा 1880 में तिरहुत स्टेट रेलवे में था। उस दौरान नदी पार करने के लिए दो बार ट्रेन पकड़नी पड़ती थी।



रेलवे के दस्तावेजों के मुताबिक, बाढ़ क्षेत्र और सुल्तानपुर घाट के बीच और बाद में मोकामा और सेमरिया घाट के बीच। तिरहुत राज्य रेलवे के पास कुछ स्टीमर थे। इसमें स्टीमर फ्लोक्स का उल्लेख किया जा सकता है। जिसे समुद्री विभाग से खरीदा गया था। ईगल नामक एक नया स्टीमर अगस्त 1880 से चलना शुरू हुआ। 1881-82 में चार स्टीमर थे, उनमें से 2 पैडल व्हील स्टीमर थे। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें पूरी कहानी...

 

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NER - फोटो : अमर उजाला

ईगल और बार्थ और दो स्क्रू स्टीमर थे। फ्लोक्स और साइलफ एक जुलाई, 1890 को राज्य के स्वामित्व वाली तिरहुत रेलवे को एक निजी स्वामित्व वाली रेलवे-बंगाल और उत्तर पश्चिम रेलवे में स्थानांतरित कर दिया गया, इस प्रकार एक छोटे राज्य रेलवे के निजी अधिग्रहण का मार्ग प्रशस्त हो गया।

 

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पहले इस तरह होते थे ट्रेन के कोच। - फोटो : अमर उजाला

माल और यात्रियों के परिवहन के लिए उत्तर पूर्व रेलवे पर आठ घाट थे जहां स्टीमर का उपयोग किया जाता था। वे इस प्रकार हैं: (ए) मोकामा घाट - सेमरिया घाट (बी) पलेजा घाट - महेंद्रू घाट (सी) अयोध्या घाट - लकरमंडी घाट (घ) बरारी घाट - महादेवपुर घाट। यह विशुद्ध रूप से खर्च का अर्थशास्त्र था क्योंकि पुल बनाने के लिए कोई प्रायोजक और सरकारी गारंटी नहीं थी। घाट और स्टीमर का उपयोग करना बहुत अधिक किफायती था।

 

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NER - फोटो : अमर उजाला।

पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक कार्यालय में जब पुरानी तस्वीरों का डिजिटलाइजेशन कराया जा रहा था। उस वक्त फेरी (स्टीमर) की तस्वीर सामने आई।

 

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स्टीमर से उतरते लोग। - फोटो : अमर उजाला।

एनईआर सीपीआरओ पंकज कुमार सिंह ने कहा कि अत्यधिक प्रवाह के कारण गंगा नदी पर पुल नहीं बन पाते थे। ऐसे में पलहेजा से महेंद्रू घाट तक एक तरफ ट्रेन से उतार कर फेरी में बैठाकर दूसरी ओर ले जाया जाता था। जिसके बाद दूसरी ट्रेन में बैठाकर यात्रा पूरी कराई जाती थी। डिजिटलाइजेश के दौरान स्टीमर की तस्वीर सामने आई है। यह काफी रोमांचित करने वाली तस्वीर है। धरोहर के रूप में इसे महाप्रबंधक कार्यालय में संरक्षित किया गया है।

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