अफगानिस्तान से गोरखपुर अपने घर लौटे शैलेंद्र और रंजीत ने कहा कि अपना देश सबसे अच्छा है, हम कभी अफगानिस्तान नहीं जाएंगे। वहां किसी की जान की कोई कीमत नहीं है। छोटी सी बात पर वहां गोलियां चला दी जाती हैं।
आपबीती: अफगानिस्तान से घर लौटे शैलेंद्र व रंजीत ने सुनाई वहां की दास्तां, बोले- सबसे अच्छा है अपना देश
घर लौटे शैलेंद्र व रंजीत ने सुनाई आपबीती, बोले- छोटी सी बात पर चलती हैं गोलियां, जान की कीमत नहीं
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रंजीत ने बताया कि उनके साथ लौटे नीतीश कुमार गुप्ता निवासी भलुअनी जनपद देवरिया और धर्मेंद्र चौहान निवासी नरांव थाना मुबारकपुर जनपद आजमगढ़ तथा गाजियाबाद के अवनीश के अलावा रंगलाल, राजेश, रामसमुझ यादव, विपिन कुमार, विरेंद्र, एमडी सद्दाम, मनोज, प्रवीण, अवधेश प्रजापति, मुन्ना सिंह, श्याम बाबू आदि कोई भी व्यक्ति अब दोबारा अफगानिस्तान नहीं जाना चाहेगा। क्योंकि वहां कोई केवल अराजकता है। तालिबानियों में शिक्षा का अभाव है। वे कलम से ज्यादा बंदूक को तवज्जो देते हैं। उनकी वजह से तमाम लोगों को न केवल अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी है बल्कि जान बचाकर अपने वतन आना पड़ा है।
चौरीचौरा क्षेत्र के नई बाजार निवासी शैलेंद्र शुक्ला ने कहा, वहां का माहौल काफी खराब है। लोगों की हालत देखकर रोना आ रहा है। तालिबान लड़ाकों ने उन्हें भी एयरपोर्ट आने के दौरान रोका था। तालिबानी छोटी-छोटी बात पर भी गोलियां चला रहे हैं। कहीं न कहीं से लगातार गोली चलने की आवाज गूंज रही है।
घर पहुंचे रंजीत तो खुशी से नाच उठा पूरा परिवार
काबुल से रंजीत रविवार को ही दिल्ली पहुंच गए थे। लेकिन परिजन उनके घर आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। रंजीत के दरवाजे पर पहुंचते ही पत्नी व बच्चों समेत पड़ोस के लोग भी खुश हो गए। पत्नी संगीता मौर्य चेचक से पीड़ित होने के बाद भी पति को देखने के लिए बिस्तर से उठकर दरवाजे पर आ गई थीं। तीनों बच्चों की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं रहा। गांव के लोग भी दरवाजे पर पहुंच गए थे। सभी रंजीत को सकुशल घर पहुंचने पर बधाई दे रहे थे। वहीं रंजीत भी लोगों के प्रति आभार जताते हुए खुश दिखे।
राघोपट्टी पड़री के नई बाजार निवासी शैलेंद्र भी सोमवार को अपने घर पहुंच गए। दरवाजे पर खड़ी मां के पैर छूकर आशीर्वाद लिया तो मां ने भी स्नेहवश मिठाई खिलाकर उनका स्वागत किया। शैलेंद्र ने बताया कि बीते 17 वर्ष से टेक्नीशियन (फोरमैन ) के पद पर कार्य करते हैं और कई देशों में रोजगार के लिए जा चुके हैं। इससे पहले 11 वर्षों तक उन्होंने श्रीलंका में कार्य किया।
आठ महीने नाइजीरिया में और पांच वर्ष ओमान में भी रह चुके शैलेंद्र ने बताया कि वह 16 जुलाई को ढाई महीने के लिए अफगानिस्तान गए थे। लेकिन वहां का अनुभव सबसे खराब रहा। आखिरी सप्ताह का हर दिन जीवन का आखिरी दिन लगता था। शैलेंद्र ने स्वदेश वापसी के लिए केंद्र व राज्य सरकार के प्रति आभार जताते हुए कहा कि अगर सरकार ने प्रयास नहीं किया होता तो वहां से सुरक्षित वापसी मुमकिन नहीं थी।