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यूपी के इस स्थान पर संत कबीर ने त्यागा था शरीर, हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है इनकी समाधि

Mon, 18 Jan 2021 03:58 PM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, मगहर।
संवाद न्यूज एजेंसी, मगहर। Published by: vivek shukla Updated Mon, 18 Jan 2021 03:58 PM IST
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Sant Kabir das Special story on Maghar sant kabir nagar
मगहर। - फोटो : अमर उजाला।

सोलहवीं सदी के महान संत कबीरदास वाराणसी में पैदा हुए थे और लगभग पूरा जीवन उन्होंने यहीं बिताया लेकिन जीवन के आखिरी समय में वो मगहर चले आए। मगहर उत्तर प्रदेश के संतकबीरनगर जिले में स्थिति एक स्थान है। उस समय एक कहावत कही जाती थी कि काशी में मरने से मोक्ष मिलता है और मगहर में नरक मिलता है। कबीर दास इसी किंवदंती या अंधविश्वास को तोड़ना चाहते थे। आगे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें...

Sant Kabir das Special story on Maghar sant kabir nagar
maghar - फोटो : अमर उजाला।

सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक सूफी संत कबीर की निर्वाण स्थली मगहर में स्थित है। 27 एकड़ में फैले कबीर चौरा परिसर में सूफी संत कबीर की एक तरफ जहां मजार है, वहीं दूसरी तरफ कबीर की समाधि स्थित है। यह स्थान सभी धर्मों के लोगों के आस्था का केंद्र बना हुआ है।

Sant Kabir das Special story on Maghar sant kabir nagar
saint kabir das - फोटो : social media

यहां देश ही नहीं विश्व के तमाम देशों से कबीर के अनुयायी आकर मत्था टेकते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। उनकी कही हुई एक-एक वाणी आज भी प्रासंगिक हैं। महंत विचारदास ने बताया कि सदगुरु कबीर की 621वीं जयंती मनाई जा रही। सदगुरु कबीर कई बार मगहर आए थे, लेकिन अंतिम रूप से सन् 1515 में नवाब बिजली खान पठान के आग्रह पर मगहर आए और यहीं अपनी तपोभूमि बनाई।


 

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मगहर। - फोटो : अमर उजाला।

यहीं पर दो वर्ष बाद सन् 1518 में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। कबीर के देहांत के बारे में एक कहानी प्रचलित है कि जब कबीर ने शरीर त्याग किया तो उनके हिंदू और मुस्लिम शिष्यों में इस बात पर झगड़ा होने लगा कि उनकी अंतिम क्रिया वे करेंगे। हिंदू कबीर के शरीर को जलाना चाहते थे, जबकि मुस्लिम उन्हें अपनी रीति से दफनाना चाहते थे। झगड़े के बीच जब शव पर से चादर हटाई गई तो शरीर की जगह कुछ फूल मिले। आधे फूल लेकर हिंदुओं ने एक समाधि बना ली और आधे फूल लेकर मुसलमानों ने मजार बना ली।

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Maghar - फोटो : अमर उजाला।

सदगुरु कबीर में हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मों के लोगों की आस्था थी। इसलिए एक तरफ मजार तो दूसरी तरफ समाधि बनाई गई, जहां समाधि है, वहां झोपड़ी थी। सन् 1518 में उनके निर्वाण के बाद प्राप्त अवशेष फूल व चादर से रीवा के राजा वीर सिंह बघेल, कबीर साहब के प्रधान शिष्य आचार्य श्रुति गोपाल साहब ने कबीर की समाधि का निर्माण कराया। 18वें आचार्य महंत श्रीगुरुप्रसाद साहब ने परिक्रमा, पूजा स्थल व चबूतरे का 1898 में जीणोद्धार कराया, जबकि बिजली खान पठान के भतीजे फिदाई खान ने मकबरे का निर्माण कराया था।

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