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रामप्रसाद बिस्मिल ने फांसी से तीन दिन पहले पूरी की थी अपनी आत्मकथा, यहां ली थी अंतिम सांस

Sat, 19 Dec 2020 11:25 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 19 Dec 2020 11:25 AM IST
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Pandit Ramprasad Bismil special story on balidan diwas
Ramprasad Bismil - फोटो : अमर उजाला।

देश के महान स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को आज ही के दिन यानि कि 19 दिसंबर 1927 को फांसी दी गई थी। आज ही के दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज हम काकोरी कांड के महानायक पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की एक खास कहानी बातने जा रहे हैं।


 

Pandit Ramprasad Bismil special story on balidan diwas
राम प्रसाद बिस्मिल - फोटो : amarujala

राम प्रसाद बिस्मिल ने 11 जून 1897 को उन्होंने यूपी के शाहजहांपुर में जन्म लिया था। अपने जीवन के आखिरी चार महीने और दस दिन उन्होंने यहां की जिला जेल में बिताए थे। फांसी के तीन दिन पहले ही उन्होंने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय पूरा किया था। 19 दिसंबर 1927 की सुबह 6:30 बजे गोरखपुर जिला जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की और मंत्र पढ़ते हुए फंदे पर झूल गए।


 

Pandit Ramprasad Bismil special story on balidan diwas
इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष के नाम से संरक्षित किया गया है। - फोटो : अमर उजाला

उनके जानने वाले बताते हैं कि अंतिम दिनों में गोरखपुर जेल उनकी साधना का केंद्र बन गई थी। 30 साल के जीवनकाल में उनकी कुल 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं थीं, जिनमें ज्यादातर अंग्रेजों ने नष्ट करा दीं।

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इस जेल में दी गई थी राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी - फोटो : अमर उजाला

गोरखपुर जेल में रहकर उन्होंने बहुत सारी रचनाएं भी लिखीं लेकिन उसे भी जेल प्रशासकों ने जलवा दिया। बिस्मिल अंग्रेजों की इस करतूत से वाकिफ थे, तभी तो उन्होंने फांसी के पहले उनकी आत्मकथा किसी मिलने आए करीबी के हाथ बाहर भिजवा दी थी।

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राम प्रसाद बिस्मिल अंतिम दिनों में इसी जगह पर बंदी रहे। - फोटो : अमर उजाला
कोठरी संख्या सात में रहते थे बिस्मिल
बिस्मिल को छह अप्रैल 1927 को काकोरी कांड का अभियुक्त मानते हुए सजा सुनाई गई। वे पहले लखनऊ जेल में रखे गए। इसके बाद उन्हें अंग्रेजों ने 10 अगस्त को 1927 को गोरखपुर जेल भेज दिया। यहां वे कोठरी संख्या सात में रहते थे। इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष के नाम से जाना जाता है।
 
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