लॉकडाउन के बीच मशरूम को स्वरोजगार का बेहतर साधन बनाया जा सकता है। इसकी पैदावार खेतों के साथ ही घर पर भी की जा सकती है। यह कहना है एमिटी यूनिवर्सिटी लखनऊ की डॉ शालिनी सिंह का। उनके साथ ही सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के डॉ. आरएस सेंगर और डॉ. गोपाल सिंह ने भी विचार रखे।
राष्ट्रीय स्तर के वेबिनार में विशेषज्ञों ने कहा कि कम लागत में अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। युवा आगे आ रहे हैं। बड़ी संख्या में जो प्रवासी लौटे हैं, वे इसे आय का प्रमुख साधन बना सकते हैं। डॉ. शालिनी सिंह ने कहा कि बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी, खेती योग्य भूमि की कमी, बदलते मौसम, पानी की कमी और अच्छी खाद सामग्री की अनुपलब्धता से चुनौती बढ़ी है।
अब जरूरत कृषि विविधता को अपनाकर आगे बढ़ने की है। मशरूम बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। अच्छी पैदावार हुई तो रोजगार की संभावना बढ़ेगी। मशरूम से उच्च गुणवत्ता युक्त प्रोटीन प्राप्त होता है। इससे कुपोषण की समस्या को दूर किया जा सकता है। शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने में भी यह कारगार है। मशरूम में पर्याप्त पोषक तत्व होते हैं।
मशरूम उत्पादन के लिए बहुत ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं होती है। यह फसल बंद कमरों में उगाई जाती है। मशरूम प्रति यूनिट क्षेत्रफल में अधिकतम प्रोटीन देने वाली फसल है। कक्ष में उगाई जाने वाली फसल वातावरण में बदलाव व प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहती है।
मशरूम की 14000 प्रजातियां
मशरूम एक विशेष प्रकार का कवक है। इसका उपयोग ताजा सूखा कर किया जाता है। विश्व भर में मशरूम की करीब 14000 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से तीन हजार खाने योग्य और 300 औषधीय गुणों से युक्त हैं। साधारण सा सफेद बटन मशरूम को ही मासूम के रूप में जाना जाता है। विश्व में मशरूम का कुल उत्पादन 40 मिलियन मीट्रिक टन है। 33 मिलियन मीट्रिक टन चीन पैदा करता है। भारत में इसका वार्षिक उत्पादन लगभग 1.55 लाख मीट्रिक टन है।