सत्तर के दशक में जब खाद कारखाना खुला था, तब गोरखपुर में स्थापित स्थानीय उद्योग ही उसे प्लास्टिक बोरे की सप्लाई करते थे। नया खाद कारखाना खुलने के बाद स्थानीय उद्योगों को यह मौका नहीं मिला है। इससे स्थानीय उद्यमियों में रोष और मायूसी है। उनकी मांग है कि उन्हें अनुपूरक उद्योग का दर्जा दिया जाए।
गोरखपुर: पहले खाद कारखाना को स्थानीय फैक्ट्रियां करती थीं बोरे की आपूर्ति, अब हाथ आई निराशा
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बता दें पुराना खाद कारखाना 20 अप्रैल 1968 को शुरू हुआ था और 1990 तक चला था। 10 जून 1990 को कारखाने में अचानक अमोनिया गैस का रिसाव हुआ था। इस घटना में एक इंजीनियर की मौत हो गई थी। इसके बाद खाद कारखाने को बंद कर दिया गया था।
कई प्रदेशों में स्थानीय उद्योगों को मिला है अनुपूरक उद्योग का दर्जा
कई प्रदेशों में स्थानीय उद्योगों को अनुपूरक उद्योग का दर्जा दिया गया है। राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में शासनादेश है कि किसी भी सरकारी संस्थान में किसी भी उत्पाद का इस्तेमाल होता है तो 20 से 25 प्रतिशत खरीद स्थानीय उद्योगों से की जाएगी। हालांकि, इसके लिए स्थानीय उद्योगों को राष्ट्रीय स्तर की टेंडर प्रक्रिया में शामिल होना होता है। किसी वजह से अगर स्थानीय उद्योग टेंडर प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं तो उन्हें टेंडर की न्यूनतम राशि की जानकारी देकर उस दर पर संबंधित उत्पाद की आपूर्ति करने का ऑफर दिया जाता है।
गोरखपुर में एचडीपी प्लास्टिक बैग बनाने वाली हैं चार फैक्ट्रियां
खाद कारखाने में हरेक महीने करीब 30 लाख हाई डेंसिटी पॉलिथीन (एचडीपी) यानी उत्कृष्ट श्रेणि वाली प्लास्टिक की बोरियों की आवश्यकता पड़ेगी। गोरखपुर में ऐसी बोरियां बनाने वाली चार फैक्ट्रियां हैं। इनमें प्रियंवदा इंडस्ट्री, एवीआर पेट्रो, माडर्न लेमिनेटर्स और श्रीकृष्णा पॉलीफैब प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। एक और खुलने वाली है।
एबीआर पेट्रो के एमडी अशोक शाव ने कहा कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान आदि प्रदेशों में केंद्रीय उपक्रमों ने स्थानीय उद्योगों को एंसिलरी उद्योग का दर्जा दिया है। इस वजह से स्थानीय उद्योगों को अपने उत्पादों की बिक्री के लिए भटकना नहीं पड़ता है। इसी तरह की सुविधा देने के लिए खाद कारखाना प्रशासन के अलावा जिला प्रशासन स्तर पर भी बात की गई है, लेकिन अब तक सार्थक परिणाम नहीं निकला है।
चेंबर ऑफ इंडस्ट्रीज उपाध्यक्ष आरएन सिंह ने कहा कि खाद कारखाना बन ही रहा था तभी प्लास्टिक का बैग बनाने वाली फैक्ट्रियां दो से बढ़कर चार हो गईं। पांचवीं जल्द खुलने जा रही है, लेकिन स्थानीय उद्योगों को प्राथमिकता नहीं देने से मायूसी है। बात तो लोकल फॉर वोकल की होती है, मगर जब मौका देने की बात आती है तो पालन नहीं किया जाता है। उद्योग बंधु की बैठक में बात रखी गई है। हमारी मांग है कि खाद कारखाना स्थानीय प्लास्टिक बैग की फैक्ट्रियों को एंसिलरी उद्योग का दर्जा दे।
मॉडर्न लेमिनेटर्स के निदेशक किशन बथवाल ने कहा कि अगर गोरखपुर के एचडीपी बैग्स बनाने वाले उद्योगों को खाद कारखाने की ओर से अनुपूरक उद्योग का दर्जा मिल जाता है तो इन उद्योगों को बहुत फायदा होगा। इससे न सिर्फ स्थानीय उत्पादों की खपत सुनिश्चित हो सकेगी, बल्कि आने वाले समय में सैकड़ों लोगों को रोजगार भी मिल सकता है। खाद कारखाना की वर्तमान जरूरतों को हम आसानी से पूरी कर सकते हैं।
चेंबर ऑफ इंडस्ट्रीज के पूर्व अध्यक्ष एसके अग्रवाल ने कहा कि खाद कारखाना बनने की घोषणा के बाद से स्थानीय उद्यमी काफी आशान्वित थे। लेकिन, प्लास्टिक बैग बनाने वाली फैक्ट्रियों को अब तक लाभ नहीं मिल सका है। जबकि, स्थानीय उद्योगों के अनुपूरक उद्योग घोषित करने के संबंध में खाद कारखाना प्रबंधन के अलावा राज्य सरकार को भी आवेदन दिया गया है।