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वाह-वाह से गूंजा गोरखपुर, जब शायर वसीम बरेलवी बोले-‘मैं चाहता भी यही था वो बेवफा निकले’

Mon, 03 Feb 2020 10:40 PM IST
विजय जैन डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर Published by: विजय जैन Updated Mon, 03 Feb 2020 10:40 PM IST
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famous poet wasim barelvi live performance at literary fest gorakhpur
गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में शायर वसीम बरेलवी। - फोटो : अमर उजाला
लिटरेरी फेस्ट के अंतिम सत्र में मुशायरे का आयोजन किया गया। कवियों और शायरों ने अपनी रचनाओं से सर्द रातों में गर्माहट भर दी। इस मौके पर डॉ. साजिद हुसैन अंसारी की किताब ‘इंतेखाब-ए-जफ र’ का विमोचन भी हुआ। प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी जब मंच पर आए तो दर्शकों/श्रोताओं का उत्साह तालियों की गड़गड़ाहट के रूप में सामने आया। उन्होंने जब सुनाया -‘उसे समझने का कोई तो रास्ता निकले, मैं चाहता भी यही था वो बेवफा निकले’ तो खूब दाद मिली।
famous poet wasim barelvi live performance at literary fest gorakhpur
गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में शायर वसीम बरेलवी व उपस्थित लोग। - फोटो : अमर उजाला
वसीम साहब ने इसके बाद ‘तुमको सोच तो पता चल गया रुसवाई को, मैंने महफूज समझ रखा था तन्हाई को’ सुनाया। बरेलवी जब तक मंच पर रहे, तालियां गूंजती रहीं। उन्होंने ‘जिस्म की चाह लकीरों से अदा करता हूं, खाक समझेगा मुसव्विर तेरी अंगड़ाई को, मैं जिन दिनों तेरे बारे में बहुत सोचता हूं, उन्हीं दिनों तो ये दुनिया समझ में आती है’  सुनाया तो खूब तालियां बजी।
famous poet wasim barelvi live performance at literary fest gorakhpur
गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में शायर वसीम बरेलवी व अन्य। - फोटो : अमर उजाला
वसीम साहब ने इसके बाद ‘जायदादें कहां बंटी उनमें, जायदादों में बंट गए भाई’ और ‘कोई टूटी सी कश्ती बगावत पर उतर आए, तो तूफां भी अपना सर उठाना भूल जाता है’ सुनाकर लोगों में जोश भर दिया।

कवि अखिलेश मिश्र ने ‘क्यों ऐसा तुमने राम रहीमा रब ईसा रख लिए इतने नाम, धर्म लड़े मजहब से पूजा नमाज से लड़ती, लाशों के संग खुली कब्र में पड़ी सियासत सड़ती, धरती पर आकर बतला जा तू अल्लाह तू राम’ सुनाकर मजहबी संघर्ष पर तीखा प्रहार किया। वहीं उन्होंने इत्तफाकन गजल के किसी शेर में नाम उनका भी था, बस उसी शेर को उम्र भर गुनगुनाते रहे... इश्क है हम छिपाते रहे इश्क है वो जताते रहे’ सुनाकर खूब वाहवाही बटोरी।
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famous poet wasim barelvi live performance at literary fest gorakhpur
गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में शायर वसीम बरेलवी व अन्य। - फोटो : अमर उजाला
शायर अबरार काशिफ  ने ‘दर्दे मुहब्बत- दर्दे जुदाई दोनों को एक साथ मिला, मैं भी तन्हा तू भी तन्हा... आ इस बात पे हाथ मिला, और ‘मैं आरजू तो नहीं हूं मगर तू पाल कर तो देख’ सुनाया। तनवीर गाजी ने ‘गर्म आंसू थम गए हैं उसके ठंडे गाल पर, कर्ज बढ़ता जा रहा है अब मेरे रुमाल पर... अब वो पीपल पूछता है तेरा साथी है कहां, लिख दिया था नाम जिसका मेरी छाल पर’ सुनाया तो महफिल श्रोताओें की तालियां से गूंज उठी।
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famous poet wasim barelvi live performance at literary fest gorakhpur
गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में शायर वसीम बरेलवी व अन्य। - फोटो : अमर उजाला
शायर कलीम कैसर ने ‘उनके बारे में सोच के अक्सर, हम भी पहरों में उदास रहते हैं, लोग कपड़े पहनकर भी कैसर, इस कदर बेलिबास रहते हैं’ सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं महेश अश्क ने ‘मैं एक पेड़ था रास्ते का, वो गुजरता समय पुकारता भी तो क्या मैं ठहर जाता’ और उड़ान भरने में जाता तो सिर्फ जाता, मगर तू कितने नए मौसमों से भर जाता’ सुनाया तो लोगों ने खूब दाद दी। मुशायरे में मौजूद डॉ. वेद प्रकाश पांडेय, अजीत अंजुम, अखिलेन्द्र मिश्र, उद्यमी अतुल सराफ, चन्द्र रक्ष अग्रवाल, ज्योति मस्करा, कुमार भवेश आदि मौजूद रहे।
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