चार फरवरी 1922 को चौरीचौरा कांड से अंग्रेजी हुकूमत हिल गई थी। इतिहास में थाने को फूंकने की घटना तो सामने आई, लेकिन इस पूरी घटना की हकीकत जानने की कोशिश ही नहीं हुई। इस घटना में सत्र न्यायालय ने 172 अभियुक्तों को फांसी की सजा सुनाई। देवरिया के बाबा राघवदास पहले ऐसे शख्स थे जो विरोध में मुखर हुए और महामना मदन मोहन मालवीय से हाईकोर्ट में वाद दाखिल कर बहस करने का अनुरोध किया था। महामना ने 10 वर्षों बाद फिर से वकालत शुरू की और मुकदमा लड़ा। जिसमें 172 की जगह सिर्फ 19 लोगों को फांसी की सजा हुई, बाकी लोगों को उच्च न्यायालय, इलाहाबाद ने बरी कर दिया।
Exclusive: बाबा राघवदास की पहल पर महामना ने की थी बहस, फांसी से मुक्त हुए थे 153 आंदोलनकारी
इस ऐतिहासिक तथ्य का उल्लेख दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग के आचार्य एवं भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद नई दिल्ली भारत सरकार के सदस्य प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी की पुस्तक में मिलता है। उनकी पुस्तक का नाम है, चौरी-चौरा : एक पुनरावलोकन, राष्ट्रीय आयाम की स्थानीय घटना। 348 पन्नों की इस पुस्तक में 120 पन्ने परिशिष्ट हैं, जिसमें घटना से संबंधित मूल दस्तावेज हैं।
चौरीचौरा घटना के शताब्दी दिवस पर चार फरवरी को इस पुस्तक के लोकार्पण की योजना है। पुस्तक के लेखक संपादक हिमांशु कहते हैं, यह पुस्तक चार काल खंडों में विभाजित है। इसमें घटना के दूसरे दिन यानी पांच फरवरी 1922 को प्रमुख समाचार पत्रों में छपी खबरों की प्रति, शहीदों के परिजनों की जुबानी, घटना से जुड़े साक्ष्यों को आधार बनाकर लिपिबद्ध किया गया है। कई ऐसे रोचक प्रसंग समाने आए हैं, जिनसे आम जनमानस अभी तक अछूता है।
जलियांवाला बाग का प्रतिबिंब है चौरीचौरा की घटना
प्रो. हिमांशु पहले खंड में लिखते हैं कि चौरीचौरा की घटना राष्ट्रीय आंदोलन था। यह गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़ा था और साहित्यकार इसे जलियांवाला बाग से जोड़कर देखते हैं। इसका विस्तार से वर्णन उन्होंने पुस्तक में किया है।
तीन लोगों को गोली लगने पर उत्तेजित हुई थी जनता
प्रो. हिमांशु की पुस्तक में कई रोचक प्रसंग छिपे हैं। दूसरे खंड में उन्होंने घटना का जिक्र किया है। जिसमें चौरीचौरा कांड के पहले महात्मा गांधी के आंदोलन से जुड़े स्वयंसेवक एकत्रित होकर जुलूस लेकर जा रहे थे। दरोगा गुप्तेश्वर सिंह ने निहत्थे स्वयंसेवकों पर गोली चलवा दी। जिसमें तीन लोग शहीद हो गए। इसके बाद भीड़ उत्तेजित हुई और थाने में आग लगा दी। 5 से 12 फरवरी 1922 के बीच कांग्रेस ने पूरी घटना को भयावह हत्याकांड बताकर खुद को अलग कर लिया।
पुलिस ने किया था भयावह तांडव
पुस्तक के तीसरे खंड में घटना के बाद पुलिस की भयावहता का विस्तार से उल्लेख है। लोगों की गिरफ्तारी से लेकर गोरखपुर सत्र न्यायालय में चले मुकदमे का जिक्र है, जिसमें 172 अभियुक्तों को फांसी की सजा दी जाती है। हाईकोर्ट में पैरवी के लिए सात दिन का समय दिया जाता है।
महामना ने साबित किया, हत्या गैरइरादतन
चौथे खंड में लिखा गया है कि बाबा राघवदास ने महामना मदन मोहन मालवीय से दरख्वास्त की है कि वे इस मुदकमे को लड़ें। महामना प्रैक्टिस छोड़ चुके थे। महामना तैयार होते हैं और धन का इंतजाम बाबा राघवदास करते हैं। इस केस में महामना ने यह साबित कर दिया कि घटना इरादतन नहीं थी। जिसके बाद उच्च न्यायालय ने इसे गैर इरादतन मानते हुए सिर्फ 19 लोगों को फांसी की सजा सुनाई।
वर्ष 2019 में विश्वविद्यालय में सम्मानित हुए थे शहीदों के परिजन
प्रो. हिमांशु बताते हैं, विश्वविद्यालय के इतिहासकारों ने कभी परिजनों की सुध नहीं ली। वर्ष 2019 में पहली बार शहीदों के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसमें सभी शहीदों के परिजनों को पहली बार आमंत्रित किया गया। यह कार्यक्रम भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद नई दिल्ली, मौलाना अबुल कलाम आजाद, इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशिया, कोलकाता और भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित किया गया था। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन के उद्घाटन सत्र में शहीदों के परिजनों को सम्मानित किया गया। इसी संगोष्ठी के विशेष सत्र में राष्ट्रीय स्तर के विद्वानों से इनका सीधा परिसंवाद स्थापित किया गया। यह पुस्तक उसी मूल संवाद का प्रतिफल है।