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Grahan 2020: इस अमृत तत्व से बेअसर होगा ग्रहण का असर, जानिए कैसे करना है इसका उपयोग

Fri, 12 Jun 2020 01:26 PM IST
vivek shukla विवेक सिंह, गोरखपुर।
विवेक सिंह, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Fri, 12 Jun 2020 01:26 PM IST
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Astronomical Event effect Amazing Special solar Eclipse 2020 on 21 June
ग्रहण

जून- जुलाई के मध्य तीन ग्रहण लगने जा रहे हैं। पांच जून का चंद्रगहण बीत गया है, 21 जून को सूर्य ग्रहण और फिर 5 जुलाई को चंद्र ग्रहण लगेगा। ग्रहण काल से पहले ही सूतक लग जाते हैं। ग्रहण के दौरान निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जा से बचाव के लिए मंदिरों से लेकर घरों तक हर वस्तु की शुद्धि के लिए तमाम साधन उपयोग में लाए जाते हैं। इन्हीं साधनों में सबसे अहम है कुश का प्रयोग। ग्रहण काल में हर वस्तु में कुश डालने की मान्यता है। कुश का महत्व सनातन धर्म के साथ ही वैज्ञानिक दृष्टि से भी बहुत अधिक है।

Astronomical Event effect Amazing Special solar Eclipse 2020 on 21 June
ज्योतिष पं. शरद चंद्र मिश्र। - फोटो : अमर उजाला

पंडित शरद चंद्र मिश्र ने बताया कि कुश ऊर्जा का कुचालक है। इसीलिए सूर्य व चंद्रग्रहण के समय इसे भोजन और पानी में डाल दिया जाता है जिससे ग्रहण के समय पृथ्वी पर आने वाली किरणें कुश से टकराकर परावर्तित हो जाती हैं। भोजन और पानी पर उन किरणों का विपरीत असर नहीं पड़ता। इस दौरान व्यक्ति को कुश का तिनका अपने शरीर से स्पर्श करते हुए भी रखना चाहिए। पुरुष अपने कान के ऊपर कुश का तिनका लगा सकते हैं वहीं महिलाएं अपनी चोटी में इसे धारण करके रखें।

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ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय। - फोटो : अमर उजाला

आसन का महत्व
पंडित नरेंद्र उपाध्याय ने बताया कि कुश से बने आसन पर बैठ कर साधना करने से आरोग्य, यश और तेज की वृद्धि होती है। साधक की एकाग्रता भंग नहीं होती। कुश मूल की माला से जाप करने से अंगुलियों के एक्यूप्रेशर बिंदु दबते रहते हैं, जिससे शरीर में रक्त संचार ठीक रहता है। भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को लाई गई कुशा वर्ष भर पवित्र रहती है। देव पूजन, यज्ञ, हवन, यज्ञोपवीत, ग्रहशांति पूजन कार्यों में रुद्र कलश एवं वरुण कलश में जल भर कर सर्वप्रथम कुशा डालते हैं। कलश में कुशा डालने का वैज्ञानिक पक्ष यह है कि कलश में भरा हुआ जल लंबे समय तक जीवाणु से मुक्त रहता है।

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सूर्यग्रहण - फोटो : ANI

क्या है धार्मिक मान्यता
पंडित राकेश उपाध्याय ने बताया कि अध्यात्म और कर्मकांड शास्त्र में प्रमुख रूप से काम आने वाली वनस्पतियों में कुश का प्रमुख स्थान है। जिस प्रकार अमृतपान के कारण केतु को अमरत्व का वर मिला है, उसी प्रकार कुश भी अमृत तत्व से युक्त है। यह पौधा पृथ्वी का पौधा न होकर अंतरिक्ष से उत्पन्न माना गया है।

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सूर्यग्रहण

मान्यता है कि जब सीता जी पृथ्वी में समाई थीं तो राम जी ने जल्दी से दौड़ कर उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु उनके हाथ में केवल सीता जी के केश ही आ पाए। ये केश राशि ही कुशा के रूप में परिणत हो गई। केतु शांति विधानों में कुशा की मुद्रिका और कुशा की आहूतियां विशेष रूप से दी जाती हैं।

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