दिल्ली एकमात्र राज्य नहीं है जहां की सरकार ने विधायकों को संसदीय सचिव बनाया और उसे लाभ के पद के आधार पर चुनौती दी गई। इस वजह से आप का विरोध करने वाली भाजपा और कांग्रेस की सरकारें भी समय-समय पर ऐसे घपले करती रही हैं। कई राज्य सरकारों के ऐसे फैसलों को विभिन्न हाईकोर्ट द्वारा असंवैधानिक भी ठहराया जा चुका है।
तमाम जोखिमों के बाद भी सरकारें क्यों नियुक्त करती हैं संसदीय सचिव, ये हैं 5 कारण
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दरअसल, जब से संविधान के अनुच्छेद 164 में किए गए संशोधन (91वां संशोधन) के जरिए यह कानून बना कि मंत्रियों की संख्या लोकसभा या विधानसभा के सदस्यों के 15 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती है, तभी से जनप्रतिनिधियों को संसदीय सचिव एवं अन्य बोर्ड एवं निगमों के चेयरमैन सरीखे पद देकर उपकृत करने का चलन बढ़ा है।
दिल्ली के मामले में मंत्रियों की संख्या को विधानसभा सदस्यों की संख्या के 10 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती है यानी वहां अधिकतम सात मंत्री बनाए जा सकते हैं। इसी तरह 30-40 सीटों वाले छोटे राज्यों में भी अधिकतम सात मंत्री बनाए जा सकते हैं। यह कानून इसलिए लाया गया ताकि मंत्रियों की संख्या को सीमित किया जा सके। इससे पहले प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री द्वारा राजनीतिक दबाव में विशालकाय मंत्रिमंडल बनाने का चलन था।
हाईकोर्ट ने कहा असंवैधानिक
नया कानून बनने के बाद से कई राज्यों में संसदीय सचिवों की नियुक्ति को हाईकोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी गई कि यह संविधान के अनुच्छेद 164 (1ए) का उल्लंघन है। आमतौर पर संसदीय सचिवों को राज्यमंत्री का दर्जा दिया जाता है। इस आधार पर कोलकाता हाईकोर्ट ने जून, 2015 में ममता बनर्जी सरकार के 24 संसदीय सचिवों की नियुक्ति को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया था।
इससे पहले मई, 2015 में हैदराबाद हाईकोर्ट ने तेलंगाना के संसदीय सचिवों की नियुक्ति पर रोक लगाई थी। इसी तरह 2009 में गोवा के दो संसदीय सचिवों की नियुक्ति को बांबे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। जबकि 2005 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में आठ मुख्य संसदीय सचिव एवं चार संसदीय सचिव की नियुक्ति के मामले में भी यही फैसला सुनाया था।
संविधान में नहीं है परिभाषा
संविधान में लाभ के पद की परिभाषा नहीं दी गई है, लेकिन पूर्व में दिए गए अपने फैसलों में चुनाव आयोग ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों के जरिए अब लाभ का पद पूरी तरह परिभाषित किया जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने किसी पद को लाभ का पद घोषित करने के पांच आधार बताए हैं:
1- क्या सरकार ने नियुक्ति की है
2- क्या सरकार को पदधारक को निलंबित करने या बर्खास्त करने का अधिकार है
3- क्या सरकार उसे पारिश्रमिक देती है
4- पदधारक के कार्य क्या हैं
5- क्या उनके कार्य के निष्पादन पर सरकार का कोई नियंत्रण है
बहरहाल, शीर्ष अदालत के अनुसार किसी पद को लाभ का पद घोषित करने के लिए सभी पांच आधार का एक साथ होना जरूरी नहीं है। इसलिए अगर लाभ के पद पर बैठा जनप्रतिनिधि वेतन और भत्ता नहीं लेता है तो उस हालत में भी अन्य आधारों पर उसकी नियुक्ति को निरस्त किया जा सकता है।