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कब बदलेगी यह तस्वीर?: स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में 21वें नंबर पर दिल्ली, कागज पर सफाई, सांसों में अब भी जहर

Mon, 07 Sep 2026 10:47 PM IST
Akash Dubey अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: Akash Dubey Updated Mon, 07 Sep 2026 10:47 PM IST
सार

स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में दिल्ली 21वें स्थान पर पहुंची, पर प्रदूषण राष्ट्रीय मानकों से काफी दूर है। सरकार ने इसके लिए हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।

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Delhi ranked 21st in Swachh Vayu Survekshan 2026
दिल्ली की हवा (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली की हवा भले ही सर्दियों में सांस लेना मुश्किल कर देती हो, लेकिन केंद्र सरकार के स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में राजधानी 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में 21वें स्थान पर पहुंच गई है। पिछले साल दिल्ली 32वें स्थान पर थी। रैंकिंग में दिल्ली की प्रदूषण नियंत्रण कोशिशों और उनके अमल को भी परखा गया है, इसलिए यह रैंक हवा के साफ होने का प्रमाण नहीं है। असली तस्वीर यह है कि प्रदूषण कम करने के तमाम प्रयासों के बावजूद दिल्ली की हवा अभी भी राष्ट्रीय मानकों से काफी दूर है। अब आने वाली सर्दी बताएगी कि कागज पर हुए प्रयास जमीन पर सांसों को कितना राहत दे पाए। 

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केवल प्रदूषण ही नहीं, मानक और भी हैं 
केंद्र के सर्वेक्षण में शहरों को केवल यह देखकर अंक नहीं दिए जाते कि उनकी हवा कितनी साफ है। सड़क की धूल, ठोस कचरा प्रबंधन, वाहनों और उद्योगों से होने वाला प्रदूषण, निर्माण एवं तोड़फोड़ के कचरे का प्रबंधन और जन-जागरूकता जैसे काम भी जांचे जाते हैं। प्रक्रिया में शहरों का स्व-मूल्यांकन, राज्य स्तर पर मंजूरी, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का मूल्यांकन और स्वतंत्र टीमों का मैदानी सत्यापन शामिल रहता है। रैंकिंग में सुधार के बावजूद दिल्ली की हवा को साफ नहीं कहा जा सकता। 2025 में राजधानी का औसत पीएम10 स्तर 198 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम2.5 स्तर 97 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। राष्ट्रीय वार्षिक मानक क्रमशः 60 और 40 माइक्रोग्राम हैं। यानी बेहतर प्रदर्शन के बावजूद प्रदूषण का स्तर सुरक्षित सीमा से काफी ऊपर है। सर्दियों में स्थिति और बिगड़ती है और एक्यूआई गंभीर श्रेणी तक पहुंच जाता है।

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पैसा खूब, अब नतीजे की बारी 
दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से लड़ने के लिए इस वित्त वर्ष में करीब 21,630 करोड़ रुपये का पर्यावरण प्रावधान किया है। आपात और अल्पकालिक प्रदूषण नियंत्रण उपायों के लिए 300 करोड़ रुपये का विशेष फंड भी रखा है। इसके अलावा विश्व बैंक के साथ 8,300 करोड़ रुपये की स्वच्छ हवा, स्वस्थ दिल्ली परियोजना शुरू हुई है। सात साल की इस परियोजना में विश्व बैंक की हिस्सेदारी 65 फीसदी और दिल्ली सरकार की 35 फीसदी होगी। अब सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम का असर दिल्ली की हवा में कितनी जल्दी दिखाई देता है।

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धूल और निर्माण पर तकनीक का सहारा
दिल्ली में सड़क की धूल कम करने, रिंग रोड को धूल मुक्त बनाने और डिवाइडरों के आसपास हरियाली बढ़ाने पर काम हो रहा है। निर्माण स्थलों की निगरानी के लिए एआई आधारित पोर्टल भी शुरू किया गया है। वाहनों के प्रदूषण पर नकेल कसने के लिए नो पीयूसी, नो फ्यूल और पुराने मानकों वाले व्यावसायिक वाहनों पर रोक जैसे कदम उठाए गए हैं। इलेक्ट्रिक बसों का बेड़ा बढ़ाने और नए ईवी चार्जिंग केंद्र तैयार करने की दिशा में भी काम चल रहा है।

दिल्ली वालों की जिम्मेदारी भी कम नहीं 
दिल्ली की हवा केवल सरकारी आदेशों से साफ नहीं होगी। करोड़ों की आबादी वाले शहर में हर नागरिक की रोजमर्रा की आदतें हवा पर असर डालती हैं। निजी वाहन का अनावश्यक इस्तेमाल कम करना, सार्वजनिक परिवहन अपनाना, कचरा नहीं जलाना, निर्माण सामग्री खुले में न छोड़ना और पीयूसी की अनदेखी नहीं करना जैसे छोटे कदम सामूहिक रूप से बड़ा असर डाल सकते हैं।

सर्दी बताएगी कितनी बदली दिल्ली 
दिल्ली की रैंकिंग में सुधार निश्चित तौर पर प्रयासों का संकेत है, लेकिन इसे जीत मान लेना जल्दबाजी होगी। पिछले साल भी प्रदूषण में सुधार का दावा किया गया था, लेकिन सर्दियों में राजधानी की हवा फिर खराब हो गई। इस बार सरकार के सामने चुनौती सिर्फ योजनाएं बनाने या बजट खर्च करने की नहीं, बल्कि उनके असर को लगातार जमीन पर दिखाने की है। दिल्ली वालों को भी अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा। क्योंकि साफ हवा की लड़ाई में सरकार और नागरिक दोनों की भूमिका बराबर है।

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