गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद से ही एक सवाल लोगों के मन में उठ रहा है कि आखिर पुलिस ने दुर्दांत विकास को पुलिस ने हथकड़ी क्यों नहींं लगाई थी। उसके हाथ क्यों नहीं बांधे गए थे, क्या उसे भागने का मौका दिया जा रहा था। इन सब सवालों का जवाब अब सामने आ गया है और इसकी जो वजह सामने आई है उसे लेकर भी बहस छिड़ गई है। जानिए क्या है वो वजह...
यूपी पुलिस ने विकास दुबे को क्यों नहीं लगाई थी हथकड़ी, सामने आई वजह
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गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद अपराधी को हथकड़ी लगाने पर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों पर सवाल उठने लगे हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर अपराधियों को हथकड़ी लगाने को अमानवीय, अतार्किक, बेहद कठोर और मनमाना ठहराया है। हालांकि पुलिस ने अपराधी को हथकड़ी लगाने का समर्थन किया है। पुलिस का कहना है कि इससे अपराधी के नहीं भागने की गारंटी रहती है।
हालांकि विकास के एनकाउंटर ने यह सवाल फिर उठा दिया कि हथकड़ी लगाई जानी चाहिए या नहीं। पुलिस का कहना है कि कार दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद विकास ने पुलिसकर्मी की पिस्टल छीनकर भागने की कोशिश की और पुलिस पर फायरिंग की। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि न्यायिक सहमति के बिना अपराधी को हथकड़ी लगाना गैरकानूनी है। ऐसे मामलों में जहां पुलिस या जेल प्रशासन के यह पुख्ता आधार है कि कैदी जेल या हिरासत से भाग सकता है, उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा और हथकड़ी लगाने की अनुमति ली जाएगी। इसके बाद मजिस्ट्रेट तय करेंगे कि हथकड़ी लगाई जाए या नहीं।
शीर्ष अदालत ने 1995 में आवाजाही की न्यूनतम आजादी हथकड़ी लगाकर या अन्य किसी तरीके से नहीं छीनी जा सकती है। जेल से कोर्ट और कोर्ट से जेल ले जाते वक्त कैदियों को हथकड़ी से आजादी देने का कानून है। पुलिस आईजी और जेल आईजी से लेकर जेल वार्डन तक को इस कानून का पालन करना होगा।
कैदी को नहीं कर सकते प्रताड़ित
सुप्रीम कोर्ट ने 1980 में प्रेम शंकर बनाम दिल्ली प्रशासन मामले में हथकड़ी लगाने पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। कोर्ट ने इसे आर्टिकल 21 के खिलाफ करार देते हुए कहा था, निश्चित तौर पर कैदी को भागने से रोकने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसकी आड़ में हम उनके साथ बर्बर व्यवहार नहीं कर सकते। हथकड़ी लगाकर हम उन्हें प्रताड़ित नहीं कर सकते।