आम आदमी पार्टी (आप) व कांग्रेस के बीच दिल्ली में गठबंधन होने की सियासी चर्चाओं के बीच बेशक दोनों दलों के नेता ना-नुकुर कर रहे हैं। लेकिन दोनों दलों में अगर समझौता होता है तो लोक सभा चुनाव में भाजपा के लिये बड़ी मुसीबत साबित होगा। मुकाबला द्विपक्षीय होने से दिल्ली की सियासी जंग दिलचस्प हो जायेगी।
तो क्या वाकई हो जाएगा आप व कांग्रेस का गठबंधन, रणनीतिकार मान रहे फायदे का सियासी सौदा
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दरसअल, आप व कांग्रेस के बीच परदे के पीछे चल रही बातचीत सार्वजनिक होने के बाद संसदीय चुनाव से एक साल पहले ही दिल्ली में सियासी सरगर्मियां तेज हो गयी हैं। दोनों दलों के नेता एक-दूसरे की समझौते के नाम पर चुगलखोरी करते दिख रहे हैं। सोशल मीडिया जंग का अखाड़ा बना हुआ है।
हालांकि, आप के सूत्र बताते हैं कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व नेताओं के जुबानी जंग से नाराज हैं। उन नेताओं को खासतौर से कड़ा मैसेज भी दिया गया है, जो सोशल मीडिया पर पिछले दो दिनों से गठबंधन पर बयानवाजी दिख रहे हैं। बताया जा रहा है कि आला नेतृत्व सियासी चर्चाओं को तूल देकर दिल्ली में पैदा हो रही नई संभावना को मारना नहीं चाहता। ऐसे में गठबंधन पर बयान न देने की पार्टी ने अपने सभी नेताओं को हिदायत दे दी है।
उधर, जानकार बताते हैं कि अगर दोनों दल साथ-साथ चुनाव में जाते हैं तो भाजपा के लिये दिल्ली की जंग बेहद मुश्किल होगी। अगर 2014 के संसदीय चुनाव को पैमाना मानें तो दिल्ली की सातों सीटों में से छह पर कांग्रेस व आप के वोट भाजपा से ज्यादा थे। सिर्फ पश्चिमी दिल्ली संसदीय सीट पर भाजपा को 48.30 फीसदी वोट मिले, जबकि आप और कांग्रेस का आंकड़ा 46.82 फीसदी था।
कांग्रेस की जनाधार वापस पाने की उम्मीद बन सकती है अड़चन
विधान सभा चुनावों की करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस के पास दिल्ली में खोन को कुछ नहीं बचा था। सियासी जानकारों का मानना है कि दिल्ली की राजनीतिक स्थितियां बदली हैं। इस बार 2014 जैसी भाजपा के पक्ष में हवा नहीं है। वहीं, कांग्रेस भी दिल्ली में मजबूत हुयी है।