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क्वीयर उत्सव 2019ः जब सड़कों पर रंगीन लिबास में उतरा समलैंगिक समुदाय, देखता रह गया हर कोई

Mon, 25 Nov 2019 01:10 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Mon, 25 Nov 2019 01:10 PM IST
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queer festival 2019 delhi homosexuals walk on street in colorful dress
क्वीयर उत्सवर 2019 - फोटो : हिमांशु सोनी

दिल्ली के बराखंभा रोड से जंतर-मंतर तक क्वीयर उत्सव 2019 में समलैंगिक समुदाय के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इनके द्वारा निकाली गई रैली देखते ही बनती थी। अलग-अलग रंगों के परिधानों में सजे समलैंगिक समुदाय के लोग अपने हाथों में तरह-तरह की तख्तियां लिए हुए थे। आगे जानिए क्या है इस उत्सव का इतिहास और भारत में क्या हैं समलैंगिकों के अधिकार....

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क्वीयर उत्सवर 2019 - फोटो : हिमांशु सोनी

क्वीयर उत्सव समलैंगिकों के मानवाधिकारों, उनकी पहचान, जेंडर और लैंगिकता के मुद्दों को उठाता है। इस उत्सव में समलैंगिक समुदाय के लोग अपने बारे में, अपने समाज के बारे में जानते हैं।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से किया बाहर
समलैंगिकता को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा 377 की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था। कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि देश में सबको समानता का अधिकार है। समाज की सोच बदलने की जरूरत है। अपना फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा था, कोई भी अपने व्यक्तित्व से बच नहीं सकता है। समाज में हर किसी को जीने का अधिकार है और समाज हर किसी के लिए बेहतर है। 

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क्वीयर उत्सवर 2019 - फोटो : हिमांशु सोनी

दरअसल सहमति से दो वयस्कों के बीच शारीरिक संबंधों को फिर से अपराध की श्रेणी में शामिल करने के शीर्ष अदालत के फैसले को कई याचिकाएं दाखिल करके चुनौती दी गई थी। जिसे देखते हुए नए सिरे से पुनर्गठित पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने चार महत्वपूर्ण विषयों पर सुनवाई शुरू की थी, जिनमें समलैंगिकों के बीच शारीरिक संबंधों का मुद्दा भी था। इस संविधान पीठ में प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के साथ न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा शामिल थे।

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क्वीयर उत्सवर 2019 - फोटो : हिमांशु सोनी

जानिए क्या है आईपीसी की धारा 377
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध बताया गया है। आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ सेक्स करता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सजा या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा। उस पर जुर्माना भी लगाया जाएगा। यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और यह गैर जमानती है।

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क्वीयर उत्सवर 2019 - फोटो : हिमांशु सोनी

भारत में कैसे संज्ञान में आई धारा-377  
सबसे पहले साल 1290 में इंग्लैंड के फ्लेटा में अप्राकृतिक संबंध बनाने का मामला सामने आया, जिसके बाद पहली बार कानून बनाकर इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया। बाद में ब्रिटेन और इंग्लैंड में 1533 में बगरी (अप्राकृतिक संबंध) एक्ट बनाया गया और इसके तहत फांसी का प्रावधान किया गया।

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