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निर्भया के दोषियों के पास बचे हैं सात दिन, ये विकल्प रह गए हैं बाकी

Thu, 06 Feb 2020 06:03 AM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Thu, 06 Feb 2020 06:03 AM IST
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Nirbhaya Case all convicts have seven days to use their legal remedies against execution know them
निर्भया के दोषी - फोटो : अमर उजाला

निर्भया के दोषियों की फांसी पर रोक लगाने वाले फैसले के खिलाफ डाली गई याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने दोषियों को अंतिम सात दिन दिए हैं। साथ ही दिल्ली हाईकोर्ट ने पटियाला हाउस कोर्ट के आदेश को रद्द करने से भी मना कर दिया है। इसका मतलब है कि चारों दोषियों को एक साथ फांसी होगी। हालांकि हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ केंद्र व दिल्ली सरकार आज ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। जानिए इन अंतिम सात दिनों में निर्भया के किस दोषी के पास कौन से विकल्प बचे हैं... 



Nirbhaya Case all convicts have seven days to use their legal remedies against execution know them
निर्भया के चारों दोषी - फोटो : Social Media

बता दें कि दोषियों की फांसी पर 31 जनवरी को पटियाला हाउस कोर्ट ने अगले आदेश तक रोक लगा दी थी। इससे 1 फरवरी को दी जाने वाली दोषियों की फांसी टल गई थी। केंद्र सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पटियाला हाउस कोर्ट ने 17 जनवरी को चारों दोषियों मुकेश कुमार सिंह (32), पवन गुप्ता (25), विनय कुमार शर्मा (26) और अक्षय कुमार (31) को 1 फरवरी को सुबह 6 बजे तिहाड़ जेल में फांसी पर लटकाने के लिए दूसरी बार ब्लैक वारंट जारी किया था। 

Nirbhaya Case all convicts have seven days to use their legal remedies against execution know them
निर्भया के दोषी - फोटो : अमर उजाला
इससे पहले, अदालत ने सात जनवरी को फांसी के लिए 22 जनवरी की तारीख तय की थी। दोषियों के वकील ने कोर्ट में दलील दी थी कि फांसी को टाला जाए, क्योंकि अभी उनके कानूनी उपचार के मार्ग बंद नहीं हुए हैं। 
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Nirbhaya Case all convicts have seven days to use their legal remedies against execution know them
- फोटो : Amar Ujala

दोषी मुकेश और विनय की दया याचिका राष्ट्रपति के पास से खारिज हो चुकी है। दोषी पवन के पास अभी ये दोनों याचिकाएं दायर करने का विकल्प है। अक्षय की दया याचिका 1 फरवरी को दाखिल हुई थी और अभी लंबित है।

चारों दोषियों की अभी यह है स्थिति

  • मुकेश सिंह और विनय शर्मा के सभी विकल्प समाप्त।
  • अक्षय सिंह की सिर्फ दया याचिका राष्ट्रपति के पास विचाराधीन।
  • पवन गुप्ता के पास सुधारात्मक और दया याचिका का विकल्प।
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Nirbhaya Case all convicts have seven days to use their legal remedies against execution know them
- फोटो : अमर उजाला

रविवार की विशेष सुनवाई में क्या थी वकीलों की दलीलें

मेहता: चारों दोषी न्याय प्रणाली के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और राष्ट्र के सब्र की परीक्षा ले रहे हैं। दोषियों की हरकतें बहुत घृणित थीं, जिसने समाज की अंतरात्मा को झकझोर दिया था, इसलिए उनकी फांसी में देरी नहीं की जा सकती। इस तरह की देरी का समाज के साथ ही दोषियों पर भी अमानवीय प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि पवन गुप्ता की समीक्षा याचिका खारिज हो चुकी है। उसने अभी तक सुधारात्मक और दया याचिका नहीं दी है।

रेबेका जॉन: निचली अदालत के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है। जब दोषी से कहा गया कि वह निचली अदालत के आदेश को यहां चुनौती नहीं दे सकता है, इसके लिए उसे सुप्रीम कोर्ट जाने को कहा गया तो यही नियम केंद्र पर भी लागू होना चाहिए। सुनवाई के दौरान केंद्र कभी निचली अदालत में पक्षकार नहीं रहा। चारों दोषियों के खिलाफ डेथ वॉरंट के लिए न तो केंद्र और न ही दिल्ली सरकार कभी निचली अदालत पहुंची।

मेहता: दोषी मुकेश की ओर से निचली अदालत में कहा कि गया वह दया याचिका नए सिरे से दाखिल करने पर विचार कर रहा है। जबकि नए सिरे से दया याचिका तभी दायर की जा सकती है जब उसमें किसी तरह की बदलाव की जरूरत हो। इससे साफ है कि दोषी के इरादे कितने घातक हैं।
रेबेका जॉन: शत्रुघ्न चौहान के मामले के संदर्भ में दया याचिका को नए तथ्यों के आधार पर चुनौती दी जा सकती है। राष्ट्रपति तथ्यों के आधार पर कोर्ट से अलग निर्णय दे सकते हैं। राष्ट्रपति क्षमा भी कर सकते हैं,  इसलिए हम जोर दे रहे हैं कि सबको एक साथ सजा दी जाए।

मेहता: सुप्रीम कोर्ट के 1982 के हरवंश सिंह बनाम उत्तर प्रदेश के मामले में एक ही अपराध के लिए अलग-अलग सजा हुई। दोषी जीता सिंह को इसलिए लाभ नहीं मिल पाया क्योंकि उसे पहले फांसी दे दी गई थी।
रेबेका जॉन: हम भी इस मामले में वह स्थिति नहीं चाहते कि किसी को फांसी मिल जाए और किसी की सजा में बाद में बदलाव हो जाए। फांसी की सजा को फांसी के बाद वापस नहीं किया जा सकता।

एपी सिंह: जेल के नियम 836 और 858 दोषियों को यह अधिकार देते हैं कि वह बचे हुए अपने कानूनी विकल्प का इस्तेमाल करें। शत्रुघ्न चौहान मामले से भी साफ है कि संविधान में फांसी देने के लिए कोई निर्धारित समय नहीं दिया गया है। केवल दया याचिका खारिज होने के बाद भी फांसी देने के लिए 14 दिन का समय मिलता है। केवल इसी मामले में इतनी जल्दबाजी क्यों। न्याय में जल्दबाजी न्याय के दफन होने जैसा है।

रेबेका जॉन: मैं बर्बर हूं, मैंने घिनौना अपराध किया है, लेकिन मैं भी अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षण का हकदार हूं। मृत्युदंड की सजा मिलने के बावजूद मैं अधिकार रखता हूं कि मुझसे उचित व्यवहार किया जाए। संविधान के अनुसार मौत की दहलीज पर खड़े दोषी के भी आखिरी सांस तक कुछ अधिकार हैं।

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