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हाशिमपुरा कांडः टॉर्च की रोशनी में ढूंढे गए थे शव, ये थी 42 हत्याओं की असल वजह

Thu, 01 Nov 2018 01:57 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गाजियाबाद/मुरादनगर/मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गाजियाबाद/मुरादनगर/मेरठ Updated Thu, 01 Nov 2018 01:57 PM IST
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hashimpura kand full timeline in torch light 42 dead body was found, this was real reason
hashimpura massacre - फोटो : अमर उजाला

हाशिमपुरा कांड गाजियाबाद जिले का वह काला अध्याय है, जिसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता। मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले से एक समुदाय विशेष के लोगों को उठाकर दिल्ली-गाजियाबाद बॉर्डर पर हिंडन कैनाल किनारे लाया गया। यहां 42 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मामला मेरठ का भले ही हो, लेकिन वारदात स्थल गाजियाबाद होने की वजह यह नाइंसाफी गाजियाबाद के इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज हो गई। मौका ए वारदात पर सबसे पहले गाजियाबाद के अफसर पहुंचे थे। यहां के दो थानों में एफआईआर दर्ज हुई और लंबे समय तक कोर्ट में मुकदमा चला। उस दौरान गाजियाबाद वीआईपी मूवमेंट और तफ्तीश का केंद्र रहा। इस स्टोरी में पढ़ें दंगे की असल वजह पीड़ितों की जुबानी और जानें पूरी घटना की टाइमलाइन... (सभी फोटोः अमर उजाला)

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hashimpura massacre - फोटो : अमर उजाला

हाशिमपुरा कांड के पीड़ित रियाजुद्दीन और मुस्तकीम बताते हैं कि असल विवाद तो शबे बरात पर पटाखों की चिंगारी के बाद शुरू हुआ था। यह चिंगारी एक टाट में जाकर गिर गई थी, जिससे वहां आग लग गई थी। इसके बाद तरह-तरह की अफवाहें फैलाई गईं, जिससे सांप्रदायिक माहौल खराब हो गया और फिर विवाद बढ़ता चला गया। वह बताते हैं कि रमजान का महीना था। अलविदा जुमे का दिन था। जुमे की नमाज पढ़कर लोग आए थे, जिसके बाद पीएसी वाले आए और तलाशी के नाम पर घरों में घुस गए और जो भी किशोर, नौजवान दिखा, सबको पकड़कर ले गए। जो ट्रक में भरकर ले जाए गए थे उन्हें मार दिया गया, जबकि जो बाकी थे उन्हें जेल में डाल दिया गया।

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hashimpura massacre - फोटो : अमर उजाला

पायजामा में रखे 200 रुपये से मिला खाना : मुस्तकीम ने बताया कि जब पीएसी वाले उन्हें पकड़कर ले गए थे उन्हें सिविल लाइन थाने में रखा गया, जहां पुलिस वाले ने उन्हें एक बार के खाने के 50 रुपये लिए। इस तरह उन्होंने दो दिन में 200 रुपये का खाना खाया, यह रुपये उन्होंने अपने पायजामा में छिपाकर रखे हुए थे।

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hashimpura massacre - फोटो : अमर उजाला

दो दिन की थी बेटी, बहुत सितम झेले: हाशिमपुरा कांड में मारे गए इकबाल की पत्नी जैबुनिशा बताती हैं कि उनकी एक बेटी उस समय महज दो दिन की थी। इसके बाद उन्होंने बहुत सितम और परेशानियां झेलीं। परेशानियां झेलकर किसी तरह परिवार को संभाला। बेटियों की परवरिश की। कोर्ट के फैसले से वह काफी हद तक संतुष्ट हैं। 
प्रशासन मांगता है भाई होने का सुबूत: इस्लामुद्दीन का कहना है कि उनका भाई भी इस हादसे में मारा गया था, उनके पास तमाम सुबूत हैं। एक बार आर्थिक सहायता भी मिल चुकी है। लेकिन इसके बाद जो सहायता सरकार ने दी, वह नहीं मिली। वह इस संबंध में कई बार प्रशासनिक अधिकारियों के पास जा चुके हैं। लेकिन हर बार उन्हें भगा दिया जाता है। अगर अब उन्हें इंसाफ नहीं मिला तो वह परिवार सहित आत्मदाह कर लेंगे।

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hashimpura massacre - फोटो : अमर उजाला

22-23 मई 1987 की रात हाशिमपुरा कांड हुआ था। उस वक्त गाजियाबाद के एसपी सिटी पूर्व आईपीएस (1975 बैच) और वरिष्ठ साहित्यकार विभूति नारायण राय थे। उन्होंने इस कांड पर पेंग्विन प्रकाशन से ‘हाशिमपुरा 22 मई’ नाम से किताब प्रकाशित की है। बकौल विभूति नारायण, उन्हें वारदात की सूचना रात साढ़े दस बजे फोन पर मिली थी। वह तत्कालीन डीएम और अन्य अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंचे, तो दृश्य देखकर होश उड़ गए।

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