कॉमनवेल्थ गेम्स में कुश्ती में गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करने वाले बजरंग की सफलता से उनके पिता काफी खुश हैं और उन्होंने बेटे का स्वागत का एक खास प्रोग्राम बना रखा है। उन्होंंने बताया है कि वो क्या करने वाले हैं...
CWG 2018: गोल्ड मेडल विजेता बजरंग के रंग में रंगेगा पूरा गांव, पिता ने की है ये खास प्लानिंग
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कॉमनवेल्थ गेम्स-2018 में देश को कुश्ती में गोल्ड मेडल जिताने वाले बहादुरगढ़ के लाल अर्जुन अवॉर्डी बजरंग पूनिया ने पढ़ाई से बचने के लिए कुश्ती की दुनिया में कदम रखा। शुरुआती संघर्ष के बाद किसान का यह बेटा अब दुनिया में कुश्ती का सितारा बनकर चमक रहा है।
ऐसे हुई शुरुआत
गांव खुड्डन के किसान बलवान पूनिया के यहां 24 फरवरी 1994 में बजरंग का जन्म हुआ। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे बजरंग का पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगता था। स्कूल से बचने के लिए अक्सर वह गांव के अखाड़े में पहुंच जाता। कुश्ती के प्रति उसकी रुचि देख पिता बलवान ने उसे अखाड़े में भेजना शुरू कर दिया। सात वर्ष की उम्र में बजरंग ने कुश्ती की एबीसीडी सीखनी शुरू की।
इसके बाद करीब 10 वर्ष की आयु में परिजनों ने उसे छारा स्थित लाला दीवानचंद अखाड़े में छोड़ दिया। यहां गुरु आर्य वीरेंद्र के मार्गदर्शन में उसके खेल में निखार आया। महज 13 वर्ष की आयु में ही बजरंग ने सब जूनियर में ब्रांज और सिलवर मेडल जीते।
इसके उपरांत बजरंग दिल्ली के छत्रसाल अखाड़े में चला गया। यहां गुरु महाबली सतपाल की देखरेख में ओलंपियन योगेश्वर के सहयोग से बजरंगी इंटरनेशनल चैंपियन बनकर उभरा। इसके बाद बजरंग ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और कामयाबी का सिलसिला शुरू हो गया।
ईरानी और क्लिंच पसंदीदा दाव
24 वर्षीय बजरंग वर्ल्ड कुश्ती चैंपियनशिप में 2 मेडल जीतने वाला एकमात्र भारतीय पहलवान है। श्रेष्ठ पहलवानी पर वर्ष-2015 में बजरंग को अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया। ईरानी और क्लिंच बजरंग के पसंदीदा दाव हैं। पहलवानी के अलावा बजरंग रेलवे में टीटीई है।