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ये प्रदूषण की सफेद चादर: छठ से पहले यमुना में उठने लगी झाग, विशेषज्ञों ने बताया क्यों हर साल होती है ऐसी दशा

Thu, 16 Nov 2023 10:44 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vikas Kumar Updated Thu, 16 Nov 2023 10:44 PM IST
सार

छठ से पहले अचानक से उठ रही की झाग पर पर्यावरणविदों का कहना है कि समुद्र, नदी समेत दूसरे जल स्रोतों में अमूमन झाग वसा के अणु वाले पौधों के गलने से बनता है, लेकिन इस वक्त यमुना की झाग के मूल में फॉस्फेट व नाइट्रेट हैं। 

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Before Chhath white foam started rising in Yamuna expert told why such a sight occurs in every year
यमुना ने ओढ़ी सफेदी की चादर - फोटो : अमर उजाला

चार दिवसीय छठ पर्व शुरू होने से पहले यमुना ने सफेदी की चादर ओढ़ ली है। दूर-दूर फैली झाग की मोटी चादर छठ व्रतियों के सब्र का इम्तिहान सी लेती नजर आ रही है। ओखला बैराज के बाद नदी का पानी भी दिखना मुश्किल है। उधर, बीते सालों की तरह यमुना की झाग ने दिल्ली की सियासी तपिश भी बढ़ाई है। दिल्ली सरकार व भाजपा ने एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा किया है।

Before Chhath white foam started rising in Yamuna expert told why such a sight occurs in every year
यमुना ने ओढ़ी सफेदी की चादर - फोटो : अमर उजाला

एनजीटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यमुना नदी की लंबाई करीब 1,370 किमी है। इसमें से पल्ला से कालिंदी कुंज की लंबाई 54 किमी है। वजीराबाद से कालिंदी कुंज का हिस्सा 22 किमी है। यह नदी की पूरी लंबाई का सिर्फ दो फीसदी है, लेकिन करीब 76 फीसदी प्रदूषण इसी हिस्से में होता है। मानसून के अलावा साल के नौ महीनों में नदी में ताजा पानी नहीं रहता।

Before Chhath white foam started rising in Yamuna expert told why such a sight occurs in every year
यमुना ने ओढ़ी सफेदी की चादर - फोटो : अमर उजाला

छठ से पहले अचानक से उठ रही की झाग पर पर्यावरणविदों का कहना है कि समुद्र, नदी समेत दूसरे जल स्रोतों में अमूमन झाग वसा के अणु वाले पौधों के गलने से बनता है, लेकिन इस वक्त यमुना की झाग के मूल में फॉस्फेट व नाइट्रेट हैं। यमुना नदी के शोधार्थी व फिलहाल सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार के प्रोफेसर डॉ. रामकुमार सिंह बताते हैं कि साल भर प्रदूषित रहने वाली यमुना में इस वक्त झाग ज्यादा इसलिए दिखता है कि सर्दी बढ़ने के साथ आक्सीजन बनने की प्रक्रिया, ऑक्सीजनेशन कहते हैं, धीमी पड़ जाती है। वहीं, ऊपर से यमुना में छठ व्रतियों के लिए ज्यादा पानी छोड़ा जाता है। ओखला बैराज से तेजी से पानी नीचे गिरने पर झाग बनती है। रामकुमार सिंह मानते हैं कि यह तो दूषित नदी के विज्ञान का सामान्य सिद्धांत है। यूरोपीय देशों के अध्ययन बताते हैं कि इसकी एक वजह नदी में अचानक से दूषित पानी में शैवालों का बढ़ जाना भी हो। इसके लिए अलग से अध्ययन की जरूरत है। तभी वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।

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यमुना ने ओढ़ी सफेदी की चादर - फोटो : अमर उजाला

दूसरी तरफ दिल्ली के बॉयोडायवसिर्टी पार्क के इंचार्ज फैयाज खुदसर बताते हैं कि पेड़-पौधों की वसा से बनने वाली झाग नुकसानदेह नहीं होती, लेकिन फास्फेट व नाइट्रेट त्वचा को नुकसान पहुंचाता है। फॉस्फेट पानी की बूंदों के सतह का तनाव (सर्फेस टेंशन) कम कर देता है। इससे बड़ी मात्रा में झाग बनती है। यह पानी ऊंचाई से गिरता है तो झाग की मात्रा बढ़ जाती है। सर्दी के मौसम में तापमान कम होने और हवा दबाव बढने से झाग बनने की तीव्रता बढ़ जाती है।

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यमुना ने ओढ़ी सफेदी की चादर - फोटो : अमर उजाला

यूं आता फास्फेट व नाइट्रेट
फास्फेट व नाइट्रेट एक तो घरों में इस्तेमाल होने वाले साबुन से आता है। वहीं, फैक्ट्रियां भी इसकी मात्रा बढ़ा देती हैं। इससे यह भी साबित हो रहा है कि यमुना में बड़ी मात्रा में अशोधित सीवेज छोड़ा जा रहा है। साबुन में फास्फेट कम करने से झाग भी सीमित हो जाएगी।

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