प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दोबारा सत्ता वापसी के साथ नए सियासी युग की शुरुआत हुई है। उत्तराखंड से सांसद रमेश पोखरियाल निशंक को मंत्रिमंडल में शामिल कर प्रधानमंत्री ने संकेत दिए हैं कि उनके राज में परंपरागत धर्म, जाति और क्षेत्रीय समीकरणों के लिए कोई स्थान नहीं है। कुमाऊं गढ़वाल के नाम पर अब और सियासी रोटियां नहीं सेंकी जाएंगी। इससे यह भी साफ हो गया कि निशंक खुद को साबित कर मोदी कैबिनेट में आए हैं।
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बीसी खंडूड़ी
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
उत्तराखंड की सियासत अब तक जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने के इर्द गिर्द घूमती रही है। चाहे कांग्रेस हो या फिर भाजपा इन समीकरणों को बैलेंस करने में कई बार योग्यता भी दरकिनार हुई है। अगर मुख्यमंत्री गढ़वाल का है तो प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊं का ही होगा। ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो यह साबित भी करते हैं। बीसी खंडूड़ी और बिशन सिंह चुफाल से लेकर त्रिवेंद्र सिंह रावत और अजय भट्ट तक यह सिलसिला जारी रहा।
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रमेश पोखरियाल निशंक
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यही हाल जातीय समीकरणों का है, जिसमें ठाकुर और ब्राह्मण को देखा जाता रहा। यहां तक कि मंत्री पद के बंटवारे में यह समीकरण बैठाया जाता है कि दोनों मंडलों से कितना कितना प्रतिनिधित्व कैबिनेट में मिलेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने पिछली सरकार में अजय टम्टा को मौका दिया तो उसे कुमाऊं और अनुसूचित जाति के समीकरण साधने से जोड़ा गया। इस बार उन्होंने पूर्व सीएम रमेश पोखरियाल निशंक को मंत्रिमंडल में जगह देकर सबको चौंका दिया।
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अजय भट्ट
- फोटो : अमर उजाला
सियासी जानकारों का गणित बता रहा था कि मोदी कैबिनेट में सियासी परंपरा के अनुसार कुमाऊं से सांसद अजय भट्ट मंत्री बनेंगे। चूंकि प्रदेश में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत गढ़वाल के पौड़ी जनपद के हैं, ऐसे में उनका गढ़वाल से तीन सांसदों में से किसी एक के मंत्री बनने की बात बेमानी लग रही थी। मोदी ने तमाम सियासी पंडितों के गणित को गलत साबित करते हुए नई परंपरा की शुरू की।
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मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत
प्रधानमंत्री मोदी ने निशंक को मंत्री पद के लिए चुना। निशंक न केवल गढ़वाल के हैं बल्कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के गृह जनपद से आते हैं। निशंक को यह ईनाम पिछले सांसद कार्यकाल में मोदी शाह के प्रति जताए विश्वास और प्रशासनिक क्षमताओं के चलते मिला है। भाजपा में हुई यह नई शुरुआत इस ओर इशारा भी है कि प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट की जगह नया अध्यक्ष कोई भी बन सकता है। वहीं, त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में रिक्त पड़े दो मंत्री पद भरने में क्षेत्रीय और जातीय समीकरण गौण रहने वाले हैं।