अजीत डोभाल: एक वक्त ऐसा आया जब लगा मेरा करियर खत्म हो गया, NSA ने छात्रों को सुनाया अपने मिशन का वो किस्सा
आईआईटी रुड़की के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अपने शुरुआती करियर का अनुभव साझा किया। युवा आईपीएस अधिकारी के तौर पर सिक्किम में इंटेलिजेंस की जिम्मेदारी संभालते हुए एक मिशन के दौरान उनके सामने ऐसी स्थिति आ गई थी, जब उन्हें अपने करियर के खत्म होने तक का डर सताने लगा था।
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आईआईटी रुड़की के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने छात्रों के बीच अपने करियर और मिशन से जुड़ा एक ऐसा अनुभव साझा किया, जब उन्हें लगा था कि उनका करियर खत्म हो गया। उन्होंने बताया कि उस मुश्किल दौर में क्या हुआ और कैसे हालात बदले।
शनिवार को दीक्षांत समारोह में शामिल होने पहुंचे एनएसए अजीत डोभाल ने छात्रों को संबोधित करते हुए बताया कि वह उस समय 20 की उम्र में थे और इंटेलिजेंस के क्षेत्र में नए थे। सिक्किम में उन्हें खुफिया तंत्र की जिम्मेदारी मिली थी। उस दौर में सिक्किम भारत में शामिल होने की प्रक्रिया से गुजर रहा था। उनकी जिम्मेदारियों में सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी के साथ चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की गतिविधियों से जुड़ी सूचनाएं जुटाना भी शामिल था।
इसी दौरान सीमा क्षेत्र में एक इंटेलिजेंस मिशन भेजा गया। टीम को करीब आठ दिन में वापस लौटना था, लेकिन तय समय बीतने के बाद भी कोई जानकारी नहीं मिली। दिन गुजरते गए। पहले पांच दिन, फिर दस दिन और इसके बाद करीब 15 दिन तक टीम वापस नहीं आई। डोभाल ने कहा कि यह स्थिति उनके लिए पेशेवर चिंता के साथ-साथ मानवीय स्तर पर भी बेहद परेशान करने वाली थी। उन्हें यह तक पता नहीं था कि मिशन पर गए लोग सुरक्षित हैं या नहीं। किसी हिमस्खलन या अन्य प्राकृतिक घटना की भी कोई सूचना नहीं थी।
मिशन पर गए लोग चीनी हिरासत में
इसी बीच मुख्यालय से उनके पास फोन आया। वरिष्ठ अधिकारी ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने कुछ लोगों को सीमा पार भेजा था। डोभाल ने बताया कि उन्हें लगा था कि टीम लौट रही होगी, क्योंकि उसे पांच-छह दिन में वापस आ जाना चाहिए था। लेकिन तब तक करीब 10-11 दिन बीत चुके थे।
इसके बाद उन्हें पता चला कि मिशन पर गए लोग चीनी हिरासत में हैं। बताया कि चीनी सैनिकों ने उन्हें पकड़कर पूछताछ की थी। बाद में बातचीत के बाद उन्हें लौटा दिया गया। जब टीम वापस आई तो उसकी हालत बेहद खराब थी।
कठिन दौर में किसी घटना को अंतिम पड़ाव मान लेना जरूरी नहीं
इस पूरे घटनाक्रम के बाद मामले की जांच शुरू हुई। डोभाल ने छात्रों को बताया कि उस समय उन्हें लगा था कि उनका करियर खत्म हो गया। वह अभी 20 की उम्र में ही थे और उन्हें लगा कि अब उन्हें अपने लिए कोई दूसरा करियर तलाशना पड़ेगा।
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हालांकि जांच पूरी होने के बाद उन्हें इस मामले में दोषी नहीं पाया गया। डोभाल ने बताया कि बाद में सामने आया कि मुख्यालय से उपलब्ध कराए गए स्केच और नक्शों में कुछ खामियां और गलतियां थीं। इसी वजह से मिशन में यह स्थिति पैदा हुई।
अपने इस अनुभव के जरिए डोभाल ने छात्रों को यह भी बताया कि करियर के कठिन दौर में किसी घटना को अंतिम पड़ाव मान लेना जरूरी नहीं है। उनका खुद का अनुभव बताता है कि जिस घटना को उन्होंने कभी अपने करियर का अंत समझ लिया था, वह उनके जीवन की आगे की यात्रा को रोक नहीं सकी।