डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है, जिसके खतरे को आसानी से टाला जा सकता है। बस इसके लिए आपको कुछ सावधानियां बरतनी होंगी।
डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है, जो एक बार हो जाए पूरी जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। खाने की जो चीज आपको पसंद है, उससे जिंदगी भर के लिए हाथ धोना पड़ता है। कई बार तो डायबिटीज बिना लक्षण आ जाती है। लोगों को पता ही नहीं चलता। जब आपरेशन या दिक्कतें बढ़ती हैं तब डायबिटीज का पता चलता है। ऐसे में 35 साल की उम्र के बाद हर साल ब्लड शुगर का टेस्ट करवाना चाहिए।
डायबिटीज से पहले प्री डायबिटीज का दौर आता है। यदि प्री डायबिटीज के दौरान ही व्यक्ति सतर्क हो जाए तो डायबिटीज से बचा जा सकता है। यदि खाली पेट आप ब्लड शुगर की जांच करवाते हैं तो शुगर लेवल 100 मिलीग्राम/डेसीलीटर होना चाहिए। यदि शुगर लेवल 100-125 मिलीग्राम/डेसीलीटर हो तो फिर प्री डायबिटीज की चपेट में है। हीमोग्लोबिन ए वन सी टेस्ट का लेवल 5.7 परसेंटेज से नीचे होना चाहिए। 5.7 से 6.4 प्रतिशत के बीच है तो प्री डायबिटीज।
जब खून के अंदर ग्लूकोज की मात्रा आउट ऑफ कंट्रोल होती है तो उसे डायबिटीज कहते हैं। भूखे पेट शुगर जांच का स्तर यदि 125 मिलीग्राम/डेसीलीटर से ज्यादा और खाने के बाद शुगर का स्तर 200 मिलीग्राम/डेसीलीटर से ज्यादा आता है तो डायबिटीज है। हीमोग्लोबिन ए वन सी टेस्ट का स्तर यदि 6.4 प्रतिशत से ऊपर आता है तो डायबिटीज कहलाता है।
टाइप वन आमतौर पर बच्चों में पाया जाता है। इसमें इंसुलिन नहीं बनता है। इंसुलिन का काम शुगर को सेल्स के अंदर पहुंचाना होता है। इसका मुख्य कारण क्या है, अब तक पता नहीं चल पाया है। पेनक्रियाज के अंदर बीटा सेल्स होते हैं, जो इंसुलिन बनाने का काम करते हैं। जब कोई वायरस शरीर के अंदर दाखिल होता है तो उसे रोकने के लिए शरीर के सेल्स उससे लड़ते हैं तो उस दौरान सेल्स बीटा सेल्स को भी खत्म कर देते हैं। बीटा सेल्स खत्म होते ही इंसुलिन बनना बंद हो जाती है और पीड़ित को टाइप वन डायबिटीज हो जाता है।