वूमेन्स डे के मौके पर हम आपको सुना रहे हैं उस महिला की कहानी, जिसे लावारिसों का मसीहा कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इनके बारे में जानकर आप सैल्यूट करेंगे इन्हें।
इस मसीहा का नाम है अमरजीत कौर ढिल्लों। 54 साल की ये महिला अब तक रिश्तेदार बनकर 500 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी है। इन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सेवा को समर्पित कर दिया है। यही कारण है कि इन्होंने अभी तक शादी भी नहीं की। इसके अलावा वे चंडीगढ़ पीजीआई में आने वाले लोगों की हर संभव मदद करती हैं। समाज सेवा के काम वे 17 सालों से जुड़ी हुई हैं।
अमरजीत कौर का कोई एनजीओ नहीं है। कभी-कभी लोग इस काम में उनकी आर्थिक मदद जरूर कर देते हैं, फिर भी पूरे तन मन और धन से वे लावारिस शवों के संस्कार का यह महान कार्य को पिछले 7 सालों से करती आ रही हैं। चंडीगढ़ में जितने भी लावारिस शव पुलिस को मिलते हैं, शिनाख्त न हो पाने पर उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी खुद अमरजीत ही उठाती हैं।
अंतिम संस्कार से पहले वे श्मशान घाट के रजिस्टर पर लावारिस शव को उम्र के हिसाब से रिश्ते का नाम देती हैं। भाई का परिवार भी इनके साथ ही रहता है। अपनी पेंशन से वे लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का खर्च उठाती हैं। अमरजीत कौर का कहना है कि महिलाएं घर की जिम्मेदारी के कारण कई बार आगे नहीं नहीं आ पातीं, लेकिन वो जो भी करती हैं उसमें नफा नुकसान नहीं सोचतीं। इसलिए वे हर औरत को सलाम करती हैं।
अमरजीत कौर बताती हैं कि वे पंजाब एंड सिंध बैंक 1980 में क्लर्क लगी। साल 2000 में उन्होंने नौकरी से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर अपना जीवन समाज सेवा में लगा दिया। लावारिस शवों के संस्कार के पीछे की कहानी सुनिए। एक बार जब वह पीजीआई में थीं, तो वहां एक डेडबॉडी आई। पत्नी के पास संस्कार के पैसे नहीं थे। पुलिस ने लावारिस लाश के तौर पर उसका चार्ज लिया। इस पर अमरजीत ने शव को अपना बताया और उसका अंतिम संस्कार खुद करवाया।