मिलिए 'द हीरो ऑफ रानीगंज' से, जिन्होंने अकेले जान की परवाह किए बिना 6 घंटे में 65 लोगों की जिंदगी बचाई थीं और पूरी दुनिया ने सराहा था उन्हें।
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'द हीरो ऑफ रानीगंज' जसवंत सिंह गिल
हम बात कर रहे हैं 1989 में कोयले की खदान में फंसे 65 लोगों को जिंदा निकालने वाले अमृतसर के इंजीनियर जसवंत सिंह गिल की। यह हादसा अब तक के कोयला खदानों में हुए सबसे बड़े हादसों में से एक था। 13 नवंबर 1989 को रानीगंज के महाबीर खदान (वेस्ट बंगाल) में कोयले से बनी चट्टानों को ब्लास्ट कर तोड़े जाने के दौरान वाटर टेबल की दीवार में क्रैक आ गया और पानी तेजी से इन दरारों से बहने लगा।
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'द हीरो ऑफ रानीगंज' जसवंत सिंह गिल
इस कारण वहां काम कर रहे 220 लोगों में से 6 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। जो लोग लिफ्ट के पास थे, उन लोगों को जल्दी से बाहर खींच लिया गया, लेकिन वहां 65 लोग फंसे रह गए थे। इस हादसे के वक्त जसवंत सिंह गिल बतौर एडिशनल चीफ मायनिंग इंजीनियर वहां पोस्टेड थे। जब जसवंत को इस हादसे की खबर लगी तो उन्होंने अपनी जान की फिक्र किए बिना तुरंत उस पानी से भरी खदान में जाने का फैसला किया।
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'द हीरो ऑफ रानीगंज' जसवंत सिंह गिल
गिल ने सबसे पहले वहां मौजूद अफसरों की मदद से पानी को पम्प के जरिए बाहर निकालने की कोशिश की, लेकिन ये तरीका कारगर नहीं रहा। इसके बाद उन्होंने वहां कई बोर खोदे, जिससे खदान में फंसे मजदूरों तक जिंदा रहने खाना-पीना पहुंचाया जा सके। तब उन्होंने एक 2.5 मीटर का लंबा स्टील का एक कैप्सूल बनाया और उसे एक बोर के जरिए खदान में उतारा।
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'द हीरो ऑफ रानीगंज' जसवंत सिंह गिल
जसवंत राहत और बचाव की ट्रेनिंग ले चुके थे। इसलिए वे उस माइन में उतरे। कई लोगों ने और सरकार ने इस बात का विरोध भी किया, लेकिन जसवंत ने किसी की बात मानते हुए रेस्क्यू जारी रखा। उनके दिए आइडिया से खदान में से एक-एक कर लोगों को उस कैप्सूल के जरिए 6 घंटे में बाहर निकाल लिया गया। जब तक सभी 65 लोगों को खदान से बाहर नहीं निकाल लिया गया, जसवंत खुद बाहर नहीं आए।