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72 साल, 212 बार अरदास और भारत-पाकिस्तान में तनाव, 8 क्लिक में पूरा करतारपुर बॉर्डर विवाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 07 Sep 2018 03:27 PM IST
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करतारपुर साहिब
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72 साल, 3 किलोमीटर का रास्ता, 212 बार अरदास और भारत-पाकिस्तान में तनाव, एक झप्पी ने सुलझा दिया। जानिए, करतारपुर बॉर्डर पर विवाद की असली कहानी और पूरा इतिहास।
नवजोत सिद्धू
पाकिस्तान ने करतारपुर बॉर्डर खोलने का ऐलान करके सिखों का जीवन सफल कर दिया। इसका श्रेय पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिद्धू को दिया जा रहा है, जिनकी पाकिस्तानी के आर्मी चीफ कमर बाजवा को दी एक एक झप्पी ने 72 साल से चल रहा विवाद सुलझा दिया। नवजोत सिद्धू पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में गए थे। वहां से लौटने के बाद सिद्धू ने बॉर्डर पर जाकर अरदास की और दूरबीर से करतारपुर साहिब के दर्शन किए। नतीजा, पाकिस्तान ने बॉर्डर का रास्ता खोलने की घोषणा कर दी।
नवजोत सिद्धू
पाकिस्तान में रावी दरिया के किनारे श्री गुरु नानक देव जी की यादों को संजोए बैठे गुरुद्वारा करतारपुर साहिब के रास्ते का मुद्दा स्वतंत्रता के बाद कई बार चर्चा का विषय बना। सात दशक तक दोनों देशों की सरकारें यह रास्ता न खुलवा सकीं। यूएनओ भी इस मामले में सिखों को कोई बड़ी राहत दिला सका। संगत डेरा बाबा नानक से करीब 1 किलोमीटर दूर सरहद पर जाकर दूरबीन से इस गुरुद्वारे के दर्शन करती थी, लेकिन अब वे श्री गुरु नानक जी की 550वीं जयंती पर पाकिस्तान जाकर गुरुद्वारा साहिब के दर्शन कर सकेगी।
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करतारपुर साहिब
क्या है गुरुद्वारा करतारपुर साहिब का इतिहास
श्री गुरु नानक देव जी ने 4 उदासियां पूरी करने के बाद अपनी जिंदगी का अंतिम समय करतारपुर साहिब में बिताया था, जहां उन्होंने 17 वर्ष 5 माह 9 दिन अपने हाथों से खेती तक की। इसी स्थान से उन्होंने समूची मानवता को काम करने तथा बांट कर खाने जैसे उपदेश दिए थे। इसी पवित्र स्थान पर वह 22 सितम्बर 1539 में आखिरी सांस ली। इससे पहले उन्होंने इस महान स्थान पर दूसरे गुरु अंगद देव साहिब को गद्दी सौंपी थी। इस स्थान से करीब 3 कि.मी. दूर भारत में डेरा बाबा नानक शहर भी गुरु नानक देव साहिब की अहम यादें संजोए बैठा है।
श्री गुरु नानक देव जी ने 4 उदासियां पूरी करने के बाद अपनी जिंदगी का अंतिम समय करतारपुर साहिब में बिताया था, जहां उन्होंने 17 वर्ष 5 माह 9 दिन अपने हाथों से खेती तक की। इसी स्थान से उन्होंने समूची मानवता को काम करने तथा बांट कर खाने जैसे उपदेश दिए थे। इसी पवित्र स्थान पर वह 22 सितम्बर 1539 में आखिरी सांस ली। इससे पहले उन्होंने इस महान स्थान पर दूसरे गुरु अंगद देव साहिब को गद्दी सौंपी थी। इस स्थान से करीब 3 कि.मी. दूर भारत में डेरा बाबा नानक शहर भी गुरु नानक देव साहिब की अहम यादें संजोए बैठा है।
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करतारपुर साहिब
महाराजा पटियाला भूपिंदर सिंह ने गुरुद्वारा साहिब की मौजूदा इमारत का निर्माण करवाया था, जिसकी 1995 में पाकिस्तान की सरकार ने मुरम्मत करवाई दी तथा 2004 में फिर इस का नवीनीकरण किया गया था। गुरु नानक देव जी का इस गुरुद्वारा साहिब के साथ गहरा संबंध होने के कारण समूचा सिख जगत इस गुरुद्वारा साहिब के दर्शन करने की गहरी इच्छा रखता है, परन्तु भारत व पाकिस्तान के मध्य अच्छा माहौल न होने के कारण सिख संगत की यह तमन्ना पूरी नहीं हो रही है, और अब पूरी होने जा रही है।